अठारह महापुराणों में ब्रह्म पुराण को परम्परागत रूप से प्रथम स्थान दिया जाता है। यह पुराण मुख्यतः सृष्टि-वर्णन, सूर्य-उपासना, तथा विशेषकर दो अत्यंत पवित्र तीर्थ-स्थलों — उड़ीसा स्थित पुरुषोत्तम क्षेत्र (जगन्नाथ पुरी) तथा गोदावरी नदी के माहात्म्य — के विस्तृत वर्णन हेतु प्रसिद्ध है। परम्परा के अनुसार यह उपदेश स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा महर्षि मरीचि को दिया गया माना जाता है, और इसी कारण इसका नाम ब्रह्म पुराण पड़ा — यद्यपि अधिकांश पुराणों की ही भांति, वर्तमान स्वरूप में यह अनेक शताब्दियों में विभिन्न आचार्यों द्वारा संकलित व संवर्धित हुआ।
पुराण का आरम्भ सृष्टि के मूल स्वरूप से होता है। इसके अनुसार, प्रलय के पश्चात जब सर्वत्र केवल जल ही जल था, तब भगवान नारायण योगनिद्रा में शयन कर रहे थे। उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिस पर स्वयं ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ। ब्रह्मा जी ने अपने संकल्प-मात्र से महत्तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) तथा इनसे क्रमशः पंचमहाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) की रचना की — इन्हीं पंचमहाभूतों के सूक्ष्म व स्थूल संयोजन से यह सम्पूर्ण दृश्य जगत, समस्त प्राणी व लोक रचे गए। इसके पश्चात् सनक, सनन्दन, सनातन व सनत्कुमार — चार मानस-पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जो जन्म लेते ही परम वैराग्यवान हो गए और सृष्टि-विस्तार के कार्य में संलग्न होने से इंकार कर दिया, जिससे ब्रह्मा जी को क्रोध आया, और उस क्रोध से रुद्र की उत्पत्ति हुई — स्वयं रुद्र ने तत्काल ग्यारह रूपों में विभाजित होकर एकादश रुद्रों की रचना की। इसके पश्चात् मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु व वशिष्ठ — सप्तर्षियों तथा दक्ष आदि प्रजापतियों की उत्पत्ति का भी वर्णन है, जिनसे आगे सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार हुआ। सूर्यवंश (इक्ष्वाकु से आरम्भ) व चन्द्रवंश (ययाति से आरम्भ) की संक्षिप्त वंशावली तथा भूमण्डल की रचना — सप्तद्वीप, सप्त समुद्र (लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध व जल के समुद्र) व मेरु पर्वत, जिसे सृष्टि की स्वर्णिम धुरी माना जाता है — का भी विस्तृत विवेचन इसमें मिलता है, साथ ही चौदह भुवनों (सात ऊर्ध्व व सात अधो लोकों) की संरचना का भी वर्णन प्राप्त होता है।
इसके साथ ही सूर्य भगवान की उपासना-विधि का विशेष वर्णन है — द्वादश आदित्यों (धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा व विष्णु) के रूप में सूर्य के बारह स्वरूपों, प्रत्येक मास में सूर्य की भिन्न-भिन्न उपासना-विधि, तथा सूर्य-मंदिरों के महत्व का विस्तृत विवेचन इस पुराण में प्राप्त होता है। कोणार्क के सूर्य-मंदिर का विशेष उल्लेख मिलता है — जिसे सूर्यदेव के विशाल रथ के रूप में, सात अश्वों (सप्त रंगों के प्रतीक) व चौबीस पहियों (दिन के चौबीस घंटों के प्रतीक) सहित, अत्यंत भव्यता से निर्मित किया गया। सूर्य-ग्रहण व संक्रांति के समय किए जाने वाले विशेष स्नान-दान का भी वर्णन मिलता है, रथ-सप्तमी व्रत की विधि व महिमा का उल्लेख है, तथा सूर्य को जल-अर्घ्य देने की नित्य विधि व उसके आध्यात्मिक महत्व का भी उपदेश दिया गया है — यह बताया गया है कि सूर्य ही समस्त जीवन के प्रत्यक्ष, दृश्यमान स्रोत हैं, अतः उनकी नित्य उपासना प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है।
किन्तु इस पुराण का सर्वाधिक प्रसिद्ध व हृदयस्पर्शी अंश है — भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति की कथा। कथा के अनुसार, मालव देश के राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान विष्णु के नीलमाधव स्वरूप के दर्शन हुए, जो उड़ीसा के सघन वन में एक नील पर्वत पर प्रतिष्ठित थे। राजा ने अपने मंत्री विद्यापति को इस दिव्य प्रतिमा की खोज हेतु भेजा। विद्यापति ने घोर वन में भटकते हुए शबर जाति के राजा विश्वावसु की कन्या ललिता से विवाह किया, और उन्हीं के माध्यम से नीलमाधव के गुप्त दर्शन प्राप्त किए — विश्वावसु अपनी कुल-देवता के रूप में इस प्रतिमा की गुप्त रूप से आराधना करते थे, और प्रतिदिन उस प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाकर ही भोजन करते थे, तथा विद्यापति को भी आंखों पर पट्टी बांधकर ही दर्शन कराए, जिसे विद्यापति ने चतुराई से सरसों के बीज अपने वस्त्र में छिपाकर मार्ग में बिखेर दिया, ताकि बाद में मार्ग पुनः खोजा जा सके। किन्तु जब राजा इन्द्रद्युम्न स्वयं भव्य यात्रा सजाकर वहां पहुंचे, तब तक वह प्रतिमा रहस्यमय ढंग से बालुका में विलीन हो चुकी थी। निराश राजा ने वहीं एक विशाल अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किया, और आकाशवाणी हुई कि समुद्र-तट पर एक दिव्य काष्ठ (दारु) बहकर आएगा, जिससे प्रतिमाएं बनाई जानी हैं।
वह दारु वास्तव में समुद्र-तट पर बहकर आया, किन्तु उसे कोई भी शिल्पी तराश नहीं पा रहा था — अनेक कुशल शिल्पियों ने प्रयास किया और असफल रहे, उनके औजार तक टूट गए। तब स्वयं भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध शिल्पी का रूप धारण कर प्रकट हुए, और राजा से यह प्रतिज्ञा करवाई कि जब तक वे स्वयं कार्य पूर्ण न कर लें, कोई भी उन्हें देखने या बाधा डालने का प्रयास न करे — इस हेतु उन्होंने स्वयं को इक्कीस दिनों के लिए एक बंद कक्ष में बंद कर लिया, जहां से निरंतर हथौड़े व छेनी की ध्वनि सुनाई देती रहती थी। किन्तु इक्कीस दिन पूर्ण होने से पूर्व ही, उत्सुकतावश तथा भीतर से ध्वनि आना बंद हो जाने के भय से रानी गुंडिचा से रहा न गया, और उन्होंने द्वार खुलवा दिया। इससे अप्रसन्न होकर विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए, अपना कार्य अधूरा छोड़कर — और इसी कारण आज भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की प्रतिमाएं बिना हाथ-पैर के, बड़ी-बड़ी गोल आंखों वाले, अपने अपूर्ण किन्तु अत्यंत मनमोहक, सरल रूप में ही पूजी जाती हैं। राजा इन्द्रद्युम्न पहले अत्यंत दुःखी हुए, किन्तु स्वयं भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर उन्हें समझाया कि यही रूप भगवान को सर्वाधिक प्रिय है, क्योंकि यह उनकी निराकार, अनंत व अगम्य प्रकृति का ही प्रतीक है — कोई भी मानवीय शिल्प-कौशल उन्हें पूर्णतः, पूर्ण रूप से चित्रित नहीं कर सकता। स्वयं ब्रह्मा जी ने ही इन तीनों प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा व नेत्रोत्सव (नेत्र-उत्कीर्णन) विधि सम्पन्न की, और इसी कारण इसे "ब्रह्म पुराण" में विशेष स्थान प्राप्त हुआ — यह चतुर्धा मूर्ति (जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा व सुदर्शन चक्र — चार रूपों में एक साथ प्रतिष्ठित होने वाली) की अपने आप में अद्वितीय परम्परा है, जो विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।
तभी से भगवान जगन्नाथ की यह अनूठी प्रतिमा पुरी में प्रतिष्ठित हुई, और प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में निकलने वाली रथयात्रा — जिसमें भगवान स्वयं तीन विशाल, भव्य रथों (जगन्नाथ के नंदीघोष, बलभद्र के तालध्वज व सुभद्रा के दर्पदलन नामक रथों) पर सवार होकर अपने मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) की यात्रा करते हैं, और जिसे खींचने में लाखों भक्त स्वयं भाग लेते हैं, चाहे वे किसी भी जाति, वर्ण अथवा देश के हों — विश्व की सबसे विशाल व प्रसिद्ध धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। इस यात्रा में स्वयं उड़ीसा के राजा भी रथ के आगे झाड़ू लगाकर "छेरा पहरा" नामक विनम्रता-विधि सम्पन्न करते हैं, यह दर्शाते हुए कि भगवान के समक्ष राजा व रंक — सभी समान हैं। मंदिर का महाप्रसाद भी अपनी इस विशेषता हेतु प्रसिद्ध है कि यह विशाल मिट्टी के पात्रों में, लकड़ी की अग्नि पर पकाया जाता है, और एक साथ लाखों भक्तों में, बिना किसी जातिगत भेद के, प्रसाद-रूप में वितरित किया जाता है — यह समानता का सिद्धांत स्वयं इस पुराण की उस मूल भावना को प्रतिबिंबित करता है कि भगवान के समक्ष कोई भेद नहीं।
पुराण में गोदावरी नदी के माहात्म्य का भी विस्तृत वर्णन है, जिसे "दक्षिण गंगा" भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति की कथा महर्षि गौतम से जुड़ी है — एक बार अकाल के समय अन्य ऋषियों ने ईर्ष्यावश छल से महर्षि गौतम पर एक मायावी गाय (जो वास्तव में माया-रचित थी) को उनके खेत में भेजा; गाय को भगाने के प्रयास में अनजाने ही उसकी मृत्यु हो गई, जिससे गौतम पर गोहत्या का कलंक लगा, और शेष ऋषियों ने उन्हें आश्रम से बहिष्कृत करने का प्रयास किया। इस पाप से मुक्ति हेतु गौतम ऋषि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, और उनसे गंगा को पृथ्वी पर, त्र्यम्बकेश्वर (नासिक) के समीप, अवतरित कराने का वरदान मांगा — यही गंगा यहां गोदावरी के नाम से प्रवाहित होकर दक्षिण भारत की सर्वाधिक पवित्र नदी बनी। इसके तट पर स्थित त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का भी विशेष महात्म्य वर्णित है — यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसका लिंग तीन मुखों (ब्रह्मा, विष्णु व शिव के प्रतीक) वाला अत्यंत विशिष्ट रूप रखता है। इस नदी में स्नान, तर्पण व पिण्डदान करने से पितरों को मुक्ति व स्वयं को पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। सिंहस्थ कुंभ का आयोजन भी इसी नदी के तट पर नासिक में होता है, जहां बारह वर्ष में एक बार लाखों श्रद्धालु व साधु-संत एकत्रित होकर स्नान करते हैं, तथा नदी के मार्ग में स्थित अन्य अनेक छोटे-बड़े तीर्थों का भी इसमें वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त पुराण में विभिन्न व्रतों, दान के महत्व, पितृ-कर्म की विधि, तथा धर्माचरण सम्बन्धी अनेक शिक्षाएं भी समाहित हैं। यम-नियम, योग-साधना के प्रारम्भिक सिद्धांत, तथा वर्णाश्रम-व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्यों का भी संक्षिप्त विवेचन इसमें मिलता है। पुराण में श्राद्ध-कर्म की विधि, तथा विभिन्न पितृ-तिथियों के अनुसार किए जाने वाले तर्पण का भी वर्णन है, तथा यह स्पष्ट किया गया है कि पितृ-ऋण से मुक्ति के बिना मनुष्य का जीवन अपूर्ण माना जाता है।
कुल मिलाकर ब्रह्म पुराण एक ओर सृष्टि के मूल सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर भगवान जगन्नाथ के अनूठे, सर्वसुलभ व सर्वस्वीकार्य स्वरूप के माध्यम से यह गहन संदेश देता है कि भगवान किसी एक निश्चित रूप, जाति या परम्परा में बंधे नहीं हैं — वे तो प्रेम व श्रद्धा से अर्पित किसी भी रूप, चाहे वह अपूर्ण ही क्यों न हो, को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, तथा गोदावरी-माहात्म्य के माध्यम से यह भी सिखाता है कि पश्चाताप व तपस्या से बड़े से बड़ा पाप भी क्षमा-योग्य बन सकता है।
(यह ब्रह्म पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
