पद्म पुराण अठारह महापुराणों में सबसे विशाल पुराणों में से एक है, और इसका नाम ही इसकी सबसे प्रसिद्ध कथा — पुष्कर की उत्पत्ति — से जुड़ा है। यह पुराण पांच प्रमुख खण्डों में विभक्त है — सृष्टि खण्ड, भूमि खण्ड, स्वर्ग खण्ड, पाताल खण्ड तथा उत्तर खण्ड — जिनमें सृष्टि-वर्णन से लेकर विष्णु-भक्ति, तीर्थ-माहात्म्य, व्रत-विधान तथा दार्शनिक उपदेशों तक अत्यंत विस्तृत विषय-वस्तु समाहित है। परम्परा के अनुसार इसमें चौपन सहस्र श्लोक हैं, जो इसे स्कन्द पुराण के पश्चात दूसरा सबसे विशाल पुराण बनाते हैं।
पुष्कर की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है — एक बार भगवान ब्रह्मा को एक महान यज्ञ करना था, जिसके लिए एक उपयुक्त, पवित्र स्थान की आवश्यकता थी, क्योंकि वज्रनाभ नामक असुर उन्हें सताया करता था, जिसके संहार हेतु भी यह यज्ञ आवश्यक था। उन्होंने अपने हाथ से एक कमल-पुष्प (पद्म) को पृथ्वी पर गिराया, और जहां-जहां उसकी पंखुड़ियां गिरीं, वहां-वहां सरोवर प्रकट हो गए — इन्हीं में सबसे प्रमुख स्थान पर, राजस्थान में, आज का पुष्कर तीर्थ स्थित है, जिसका नाम भी "पद्म" से ही व्युत्पन्न है, और जहां वज्रनाभ का संहार भी सम्पन्न हुआ। यज्ञ के निश्चित मुहूर्त पर जब ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री यज्ञ-स्थल पर विलम्ब से पहुंचीं, तब शुभ मुहूर्त न चूकने हेतु ब्रह्मा जी ने समीप खड़ी एक ग्वालन कन्या गायत्री से विधिवत विवाह कर उन्हें यज्ञ-पत्नी के रूप में साथ बिठाकर यज्ञ सम्पन्न किया। जब सावित्री पहुंचीं और यह दृश्य देखा, तो अत्यंत क्रोधित होकर उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दिया कि पुष्कर के अतिरिक्त कहीं भी संसार में उनकी पूजा नहीं होगी, तथा उपस्थित विष्णु, शिव व अन्य देवताओं को भी विभिन्न शाप देने लगीं — विष्णु को मनुष्य-योनि में जन्म व पत्नी-वियोग सहने का (जो आगे राम-अवतार में सत्य सिद्ध हुआ), इन्द्र को युद्ध में बार-बार पराजय का, तथा अग्नि को सर्वभक्षी होने का शाप भी दिया — जिनमें से कुछ शापों को वहां उपस्थित देवताओं ने विनयपूर्वक निवेदन कर आंशिक रूप से शांत किया। यही कारण है कि आज भी विश्व में ब्रह्मा जी का प्रमुख मंदिर केवल पुष्कर में ही विद्यमान है। बाद में सावित्री व गायत्री — दोनों ही देवियां, जो पुष्कर के निकट पर्वतों पर स्वयं देवी-रूप में प्रतिष्ठित हैं, एक-दूसरे से मिलकर सामंजस्य स्थापित करती हैं, जो यह सिखाता है कि क्षणिक क्रोध चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, अंततः समाधान व समन्वय ही शेष रहता है।
इसी पुराण में राजा पृथु की प्रसिद्ध कथा भी वर्णित है। राजा वेन अपने पिता अंग के पश्चात राजा बने, किन्तु वे अत्यंत अधर्मी व अहंकारी निकले — उन्होंने यज्ञ व वेद-कर्म का निषेध कर स्वयं को ही परम पूज्य घोषित कर दिया, और यह घोषणा की कि प्रजा अब केवल उनकी ही पूजा करे, किसी देवता की नहीं। क्षुब्ध ऋषियों ने पहले समझाने का प्रयास किया, किन्तु असफल होने पर अपने मंत्र-बल से ही उनका वध कर दिया। किन्तु राज्य में उत्तराधिकारी न होने से अराजकता व अव्यवस्था फैलने की आशंका हुई, अतः ऋषियों ने वेन के शरीर का मंथन किया — उनकी जंघा के मंथन से एक काले, कुरूप, वामन पुरुष (निषाद, जिससे अनार्य जातियों की उत्पत्ति मानी जाती है) की उत्पत्ति हुई, जिसमें वेन के समस्त दुर्गुण समाहित थे, और उसे वन भेज दिया गया। इसके पश्चात् वेन की दाहिनी भुजा के मंथन से एक तेजस्वी, दिव्य पुरुष — पृथु — प्रकट हुए, जो आदर्श, प्रजावत्सल राजा सिद्ध हुए। उनके राज्याभिषेक के समय स्वयं देवताओं व ऋषियों ने उन्हें अनेक दिव्य आशीर्वाद, अस्त्र व वाहन प्रदान किए, तथा स्वयं भगवान विष्णु ने अपने ही अंश से उनमें प्रवेश किया, जिस कारण राजा को अंशावतार भी माना जाता है।
उनके शासनकाल में, पूर्व अराजकता के कारण पृथ्वी ने अन्न व औषधियां देना बंद कर दिया था, जिससे प्रजा भूख से त्रस्त हो गई। क्रुद्ध राजा पृथु ने अपना धनुष उठाकर पृथ्वी का पीछा किया, जो भयभीत होकर गाय का रूप धारण कर भाग निकली। अंततः पृथ्वी ने गाय-रूप में राजा के समक्ष समर्पण कर यह निवेदन किया कि उसके दोहन हेतु एक उपयुक्त बछड़ा व समतल पात्र (पृथ्वी की अपनी सतह ही) चाहिए। राजा पृथु ने स्वयं मनु को बछड़ा बनाकर, अपने ही हाथों में पात्र लेकर, पृथ्वी-रूपी गाय से समस्त अन्न, बीज, औषधियां, जल व खनिज-सम्पदा प्राप्त किए, जिससे सम्पूर्ण मानव-जाति हेतु कृषि व समृद्धि का आरम्भ हुआ। उनके पश्चात् अन्य ऋषियों, असुरों व देवताओं ने भी अपने-अपने प्रयोजनों हेतु पृथ्वी-गाय का दोहन किया — देवताओं ने इन्द्र को बछड़ा बनाकर अमृत-तुल्य ओज, असुरों ने विरोचन को बछड़ा बनाकर मदिरा, तथा ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा बनाकर वेद-ज्ञान प्राप्त किया। इसी कारण पृथ्वी का एक नाम "पृथ्वी" (पृथु के नाम पर) भी पड़ा, और राजा पृथु को आदि-कृषक, आदि-राजा व चक्रवर्ती सम्राट के रूप में सम्मानित किया जाता है।
पद्म पुराण में भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण की भक्ति-महिमा का भी विस्तृत वर्णन है, साथ ही एकादशी व्रत का माहात्म्य विशेष रूप से वर्णित है — एक कथा के अनुसार, मुर नामक असुर के अजेय आतंक से त्रस्त देवताओं की सहायता हेतु भगवान विष्णु की ही एक शक्ति ने देवी "एकादशी" के रूप में प्रकट होकर उस असुर का संहार किया, और प्रसन्न भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि जो भी भक्त एकादशी तिथि को व्रत व उपवास रखेगा, उसे विशेष पुण्य-फल प्राप्त होगा। प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों (शुक्ल व कृष्ण) का पृथक-पृथक नाम व माहात्म्य भी पुराण में विस्तार से वर्णित है — जैसे निर्जला एकादशी (जिसमें जल-त्याग सहित निर्जल व्रत रखा जाता है, जो वर्ष की समस्त चौबीस एकादशियों के बराबर पुण्य-फल देने वाला माना जाता है), देवशयनी एकादशी व देवप्रबोधिनी एकादशी, जिनसे चातुर्मास का आरम्भ व समापन जुड़ा है, तथा मोक्षदा एकादशी, जिसका सम्बन्ध गीता-उपदेश से भी जोड़ा जाता है।
कार्तिक-मास-माहात्म्य — जिसमें तुलसी-पूजा, दीपदान व राधा-कृष्ण भक्ति का विशेष महत्व बताया गया है — तथा तुलसी-माहात्म्य का भी विस्तृत वर्णन इस पुराण में मिलता है, जिसमें तुलसी-पत्र के बिना भगवान विष्णु के भोग को अपूर्ण माना गया है। भूमि खण्ड में अनेक राजाओं व भक्तों की कथाएं हैं, जिनमें से एक राजा मोरध्वज की कथा विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनकी परीक्षा हेतु स्वयं श्रीकृष्ण व अर्जुन ने ब्राह्मण-वेश में उनके पुत्र का मांस मांगा, और राजा व उनकी पत्नी-पुत्र — तीनों ने ही बिना किसी हिचकिचाहट के, अपने वचन व धर्म-निष्ठा की रक्षा हेतु, यह बलिदान देने का प्रयास किया — जब राजा स्वयं आरा से अपने पुत्र का शरीर काटने लगे, तब उनके नेत्रों से एक भी अश्रु न गिरना देखकर स्वयं श्रीकृष्ण को संदेह हुआ कि कहीं राजा में पुत्र-स्नेह की कमी तो नहीं, किन्तु राजा ने उत्तर दिया कि यह आंसू केवल इसलिए नहीं बह रहे क्योंकि यह कर्तव्य-पालन है — यह सुनकर भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए और पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया।
भूमि खण्ड में ही गणेश-चतुर्थी व्रत का भी विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें गणेश जी के विघ्नहर्ता स्वरूप व उनकी उपासना-विधि का विवेचन है। स्वर्ग खण्ड व पाताल खण्ड में भगवान श्रीराम की कथा का भी एक संक्षिप्त, भक्ति-प्रधान संस्करण प्राप्त होता है, जिसमें रावण-वध व सीता-माता की महिमा पर विशेष बल दिया गया है, तथा विभिन्न स्वर्गिक व पाताल-लोक सम्बन्धी वर्णन भी इसमें सम्मिलित हैं — पाताल के सात लोकों (अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल व पाताल) का विवरण तथा वहां के नाग-राजाओं का भी उल्लेख मिलता है।
उत्तर खण्ड में विशेषतः वैष्णव भक्ति-सिद्धांतों, नाम-जप की महिमा (विशेषकर "राम" नाम के जप का माहात्म्य), तथा विभिन्न तीर्थों की यात्रा-विधि का विस्तृत विवेचन मिलता है, साथ ही शिव-विष्णु के मध्य अभेद का भी एक गहन दार्शनिक विवेचन इस खण्ड में प्राप्त होता है — यह स्पष्ट किया गया है कि हरि-हर वस्तुतः एक ही परम सत्य के दो नाम हैं, और उनमें भेद मानना अज्ञान-मात्र है। इसी खण्ड में भगवद्गीता के माहात्म्य का भी एक पृथक अध्याय मिलता है, जो गीता-पाठ के फल का विस्तृत वर्णन करता है।
पद्म पुराण की यह विशेषता है कि यह एक साथ सृष्टि-विज्ञान, तीर्थ-माहात्म्य, व्रत-विधान तथा भक्ति-सिद्धांत — इन सभी को एक विशाल, व्यापक फलक पर समेटे हुए है, और पुष्कर जैसे अद्वितीय तीर्थ की उत्पत्ति-कथा के माध्यम से यह सिखाता है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी कभी-कभी मानवीय भावनाओं — क्रोध, प्रेम, शाप — के अधीन होकर ही अपनी विशिष्ट पहचान पाते हैं, और राजा पृथु व मोरध्वज जैसी कथाओं के माध्यम से यह सिखाता है कि एक धर्मनिष्ठ शासक व भक्त अपने वचन व कर्तव्य के समक्ष अपना सर्वस्व भी त्यागने को तत्पर रहता है।
(यह पद्म पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त खण्डों, अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
