विष्णु पुराण की रचना महर्षि पराशर द्वारा अपने शिष्य मैत्रेय को उपदेश के रूप में हुई है। मैत्रेय ने जिज्ञासावश अपने गुरु से पूछा — हे गुरुदेव, इस सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति, इसकी स्थिति और इसके प्रलय का रहस्य क्या है? किस शक्ति से यह सब रचा जाता है, पालित होता है, और अंततः विलीन हो जाता है? पराशर मुनि ने इस जिज्ञासा के उत्तर में इस सम्पूर्ण पुराण की रचना की, जिसमें भगवान विष्णु को ही सृष्टि के मूल कारण, पालनकर्ता और अंततः संहारकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है — सत्, रज और तम तीनों गुणों से परे, और फिर भी अपनी लीला से इन्हीं गुणों के माध्यम से सृष्टि-रचना करने वाले परब्रह्म के रूप में। यह पुराण छह अंशों (भागों) में विभक्त है, और अपनी व्यवस्थित रचना-शैली, दार्शनिक गहराई तथा ऐतिहासिक वंशावलियों के कारण अठारह पुराणों में विशेष व प्रामाणिक स्थान रखता है।
प्रथम अंश — सृष्टि, प्रह्लाद और ध्रुव
प्रथम अंश का आरम्भ सृष्टि के मूल तत्त्वों के वर्णन से होता है — महत्तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राएं, पंचमहाभूत — इन सबके क्रमिक विकास से यह दृश्य जगत कैसे रचा जाता है, इसका विस्तृत दार्शनिक विवेचन किया गया है। इसके पश्चात् ध्रुव की कथा आती है — एक छोटे बालक की, जिसे अपनी सौतेली माता सुरुचि के कटु वचनों से यह आघात लगा कि वह अपने पिता राजा उत्तानपाद की गोद में भी अधिकारपूर्वक नहीं बैठ सकता, क्योंकि वह दूसरी रानी का पुत्र नहीं। इस अपमान से विचलित होकर पांच वर्ष का बालक ध्रुव वन की ओर निकल पड़ा, यह संकल्प लेकर कि वह ऐसा पद प्राप्त करेगा जो किसी से छीना न जा सके। वन में देवर्षि नारद से भेंट होने पर उन्होंने ध्रुव को भगवान विष्णु की उपासना का मार्ग दिखाया। ध्रुव ने कठोर तप किया — प्रथम मास फल-फूल पर, द्वितीय मास जल पर, तृतीय मास वायु पर ही जीवित रहकर, और अंततः निराहार रहकर इतनी गहन समाधि में स्थित हो गया कि उसके तप की उष्मा से स्वर्गलोक तक कंपायमान हो उठा। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और ध्रुव को अचल पद प्रदान किया — वही पद जिसे आज हम ध्रुव तारा (पोल स्टार) के नाम से जानते हैं, जो आकाश में सदा अपने स्थान पर अटल रहता है जबकि शेष सभी नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते हैं।
इसी अंश में प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की अमर कथा आती है। असुर-राज हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से यह वर प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु न दिन में हो न रात्रि में, न भीतर हो न बाहर, न पृथ्वी पर हो न आकाश में, न किसी मनुष्य से हो न किसी पशु से, न किसी अस्त्र से हो न किसी शस्त्र से — इस प्रकार स्वयं को अमर-तुल्य मानकर उसने तीनों लोकों पर अपना आतंक स्थापित कर लिया और स्वयं को ही परम पूज्य घोषित कर दिया। किन्तु उसी का पुत्र प्रह्लाद गर्भ में रहते ही, माता के माध्यम से देवर्षि नारद के उपदेशों से, भगवान विष्णु का अनन्य भक्त बनकर जन्मा। पिता के अनेक प्रयासों — गुरुकुल में अन्य शिक्षा देने, विष पिलाने, हाथियों से कुचलवाने, पर्वत से गिरवाने, सर्पों से डसवाने, अग्नि में झोंकने — के बावजूद भी प्रह्लाद अविचल भाव से "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करता रहा, और हर बार भगवान की कृपा से सुरक्षित रहा। अंततः क्रुद्ध हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा — "यदि तेरा विष्णु सर्वव्यापी है, तो क्या वह इस स्तम्भ में भी है?" और स्तम्भ पर प्रहार किया। उसी क्षण उस स्तम्भ से भगवान नृसिंह — आधे सिंह, आधे मनुष्य रूप में — प्रकट हुए। सन्ध्याकाल (न दिन न रात्रि) में, द्वार की चौखट पर (न भीतर न बाहर), अपनी जंघा पर रखकर (न पृथ्वी न आकाश), अपने ही नखों से (न अस्त्र न शस्त्र) — इस प्रकार अपने ही दिए वरदान की प्रत्येक सीमा के भीतर रहते हुए भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया। यह कथा भक्त की रक्षा हेतु भगवान की अद्भुत लीला-शक्ति तथा यह सत्य उजागर करती है कि अहंकार चाहे कितने भी वरदानों से सुरक्षित क्यों न हो, सच्ची भक्ति के समक्ष टिक नहीं सकता।
इसी अंश में समुद्र-मंथन की विस्तृत कथा भी वर्णित है। महर्षि दुर्वासा के शाप से देवराज इन्द्र व समस्त देवगण शक्तिहीन हो गए थे, जिससे असुरों का बल बढ़ गया। भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों के साथ संधि कर क्षीरसागर के मंथन का प्रस्ताव रखा, ताकि अमृत प्राप्त हो सके। मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया, और स्वयं भगवान विष्णु ने कूर्म (कच्छप) रूप धारण कर मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया। मंथन से सर्वप्रथम हलाहल नामक भयंकर विष निकला, जिसे भगवान शिव ने संसार की रक्षा हेतु स्वयं पी लिया और अपने कंठ में धारण कर लिया — इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए। तत्पश्चात् क्रमशः कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा अश्व, कल्पवृक्ष, देवी लक्ष्मी, वारुणी, तथा अमृत-कलश सहित वैद्यराज धन्वन्तरि — चौदह रत्न प्रकट हुए। अमृत पाते ही असुरों में छीना-झपटी होने लगी, तब भगवान विष्णु ने परम सुन्दरी मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को मोहित किया और अमृत का वितरण केवल देवताओं में सुनिश्चित किया। राहु नामक असुर ने छल से देव-पंक्ति में बैठकर अमृत-पान कर लिया, किन्तु सूर्य व चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया, और भगवान विष्णु ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया — किन्तु अमृत कंठ तक पहुंच चुका था, अतः सिर (राहु) व धड़ (केतु) दोनों अमर होकर आकाश में स्थान पाए।
द्वितीय अंश — भूगोल, भरत की कथा और धर्म-व्यवस्था
द्वितीय अंश में भूमण्डल की विशाल भौगोलिक रचना का वर्णन है — सप्तद्वीप (जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप आदि), उन्हें घेरने वाले सप्त समुद्र, तथा जम्बूद्वीप के मध्य स्थित मेरु पर्वत व उसके चारों ओर फैले नौ वर्षों में से एक भारतवर्ष का विस्तृत वर्णन है। इसी अंश में राजा भरत की गहन नैतिक कथा आती है, जो तीन जन्मों में फैली है। राजा भरत — जिनके नाम पर इस भूमि का नाम भरतवर्ष/भारतवर्ष पड़ा — अत्यंत धर्मपरायण सम्राट थे, जिन्होंने अंततः राज्य त्यागकर वन में तपस्या आरम्भ की। किन्तु एक दिन उन्होंने एक अनाथ मृगशावक को बचाया और उसका पालन-पोषण करते हुए उससे इतनी गहरी आसक्ति कर बैठे कि मृत्यु के समय भी उनके मन में उसी मृग का ही चिंतन रहा — और इसी कारण उनका अगला जन्म एक मृग-योनि में हुआ। मृग-रूप में भी भरत को अपने पूर्वजन्म का स्मरण बना रहा, और वे पुनः तपस्या में लीन रहे। इस जन्म के पश्चात् उनका तीसरा जन्म एक ब्राह्मण-कुल में हुआ, जहां वे "जड़ भरत" के नाम से प्रसिद्ध हुए — संसार से पूर्ण विरक्त, स्वयं को जड़-मूढ़ प्रदर्शित करते हुए, किसी भी सांसारिक सम्बन्ध या कर्तव्य में न बंधते हुए। एक अवसर पर राजा रहूगण की पालकी ढोने हेतु उन्हें बलपूर्वक नियुक्त किया गया, और असावधानी से डगमगाती पालकी पर क्रुद्ध होकर राजा ने उन्हें फटकारा — तब जड़ भरत ने राजा को आत्मा व शरीर के भेद, तथा समस्त सांसारिक बंधनों की नश्वरता पर ऐसा गूढ़ उपदेश दिया कि राजा स्वयं उनके चरणों में नतमस्तक हो गए। यह सम्पूर्ण कथा यह गहन शिक्षा देती है कि मृत्यु के समय मन में जो भाव प्रबल होता है, वही अगले जन्म की दिशा निर्धारित करता है — चाहे वह आसक्ति किसी मृगशावक के प्रति ही क्यों न हो। इसी अंश में विभिन्न नरकों का वर्णन तथा वर्णाश्रम-धर्म की सम्पूर्ण व्यवस्था का भी विवेचन किया गया है।
तृतीय अंश — वेद, मन्वन्तर और धर्म-व्यवस्था
तृतीय अंश में यह बताया गया है कि प्रत्येक द्वापर युग में स्वयं भगवान विष्णु वेदव्यास के रूप में अवतरित होकर एक मूल वेद को चार भागों — ऋक्, यजु, साम व अथर्व — में विभाजित करते हैं, तथा प्रत्येक शाखा को योग्य शिष्यों को सौंपते हैं। इसी क्रम में वेद की विभिन्न शाखाओं व उनके प्रवर्तक ऋषियों का विस्तृत वर्णन है। इसके साथ ही प्रत्येक मन्वन्तर के सप्तर्षियों, पितरों के विभिन्न वर्गों, तथा धर्मराज यम द्वारा जीवों के कर्मानुसार न्याय किए जाने की प्रक्रिया का भी वर्णन है। चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) तथा चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) के कर्तव्यों का यहां अत्यंत विस्तार से विवेचन किया गया है — विशेषतः गृहस्थाश्रम को पंचमहायज्ञों (देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ऋषियज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ अर्थात् अतिथि-सत्कार) सहित सबसे महत्वपूर्ण आश्रम बताया गया है, क्योंकि यही शेष तीनों आश्रमों का भी आधार है।
चतुर्थ अंश — सूर्यवंश व चन्द्रवंश की वंशावली
चतुर्थ अंश सूर्यवंश व चन्द्रवंश की अत्यंत विस्तृत व क्रमबद्ध राजवंशावली प्रस्तुत करता है। सूर्यवंश में इक्ष्वाकु से लेकर राजा सगर (जिनके साठ हजार पुत्रों की भस्म से गंगा के अवतरण की कथा जुड़ी है), भगीरथ, तथा अंततः मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तक की पीढ़ियों का वर्णन है। चन्द्रवंश में पुरुरवा-उर्वशी से आरम्भ कर ययाति, कुरु, तथा अंततः पाण्डवों व कौरवों तक की पीढ़ियों का क्रमबद्ध वर्णन है, जो आगे आने वाले श्रीकृष्ण-अवतार की ऐतिहासिक व पौराणिक पृष्ठभूमि भी रचता है। यह अंश प्राचीन भारतीय इतिहास, राजनीति व वंशावली के अध्ययन हेतु विद्वानों द्वारा अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
पंचम अंश — श्रीकृष्ण-चरित्र
पंचम अंश — जो समूचे पुराण का सबसे विशाल व सर्वाधिक लोकप्रिय भाग है — भगवान श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र का क्रमबद्ध व विस्तृत वर्णन करता है। मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को आकाशवाणी द्वारा यह ज्ञात हुआ कि देवकी की आठवीं संतान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी — इस भय से उसने देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया और एक-एक कर उनकी संतानों का वध करता गया। आठवीं संतान — स्वयं श्रीकृष्ण — के जन्म पर कारागार के पहरेदार मोहनिद्रा में सो गए, बेड़ियां स्वतः खुल गईं, और वसुदेव अर्धरात्रि में यमुना पार कर शिशु कृष्ण को गोकुल में नंद-यशोदा के घर छोड़ आए, बदले में उनकी नवजात कन्या को ले आए। इसके पश्चात् वृन्दावन में श्रीकृष्ण की अनेक बाल-लीलाएं हुईं — पूतना नामक राक्षसी, जो विषयुक्त स्तनपान द्वारा शिशु कृष्ण का वध करने आई थी, स्वयं उनके हाथों मुक्ति पा गई; शकटासुर व तृणावर्त नामक राक्षसों का वध; माखन-चोरी की मनमोहक बाल-लीलाएं; कालिय नाग का दमन, जिसने यमुना के जल को विषैला कर दिया था — श्रीकृष्ण ने उसके फणों पर नृत्य कर उसे पराजित किया और यमुना से सदा के लिए दूर भेज दिया; तथा इन्द्र के कोप से क्रुद्ध होकर हुई मूसलाधार वर्षा से सम्पूर्ण वृन्दावनवासियों की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर सात दिन तक धारण करना — जिससे इन्द्र का अहंकार भी भंग हुआ। इसी काल में रासलीला का वर्णन है, जिसे भक्ति-परम्परा में जीवात्मा व परमात्मा के मिलन के दिव्य व आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में देखा जाता है, न कि लौकिक दृष्टि से।
युवावस्था में अक्रूरजी के आमंत्रण पर श्रीकृष्ण व बलराम मथुरा गए, जहां उन्होंने कंस के मल्लों — चाणूर व मुष्टिक — को परास्त कर अंततः कंस का भी वध किया और अपने वास्तविक माता-पिता देवकी-वसुदेव को कारागार से मुक्त कराया। इसके पश्चात् संदीपनि मुनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की। जरासंध द्वारा मथुरा पर बार-बार आक्रमण होने तथा प्रजा की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण मथुरा छोड़कर समुद्र में बसी द्वारका नगरी ले गए — यहीं से उन्हें "रणछोड़" भी कहा गया, जो पलायन नहीं अपितु प्रजा-रक्षा हेतु सुविचारित रणनीति थी। विदर्भ-राजकुमारी रुक्मिणी ने, जिनका विवाह बलपूर्वक शिशुपाल से कराया जा रहा था, स्वयं श्रीकृष्ण को पत्र भेजकर अपने हरण की प्रार्थना की — श्रीकृष्ण ने विवाह-मण्डप से ही रुक्मिणी का हरण कर विधिवत विवाह किया। इसी काल में प्रसिद्ध स्यमन्तक मणि की कथा भी आती है — सत्राजित के पास स्यमन्तक नामक दिव्य मणि थी, जिसके खो जाने पर श्रीकृष्ण पर ही चोरी का मिथ्या आरोप लगा; सत्य की खोज में श्रीकृष्ण ने स्वयं जाम्बवान से भीषण युद्ध कर मणि प्राप्त की और निर्दोष सिद्ध हुए, तथा अंततः जाम्बवन्ती व सत्यभामा से भी विवाह किया। इस अंश के अंत में महाभारत-युद्ध की पृष्ठभूमि व श्रीकृष्ण की पाण्डवों के सखा व मार्गदर्शक के रूप में भूमिका का संक्षिप्त उल्लेख भी है। यह सम्पूर्ण अंश भगवान की लीलाओं के माध्यम से भक्ति-भाव जाग्रत करने के उद्देश्य से रचा गया प्रतीत होता है, और परवर्ती सम्पूर्ण कृष्ण-भक्ति साहित्य — श्रीमद्भागवत सहित — पर इसका गहरा प्रभाव रहा है।
षष्ठ अंश — कलियुग, प्रलय और उपसंहार
षष्ठ व अंतिम अंश में कलियुग के लक्षणों का अत्यंत स्पष्ट व विस्तृत वर्णन है — कैसे इस युग में राजा प्रजा की रक्षा के स्थान पर उनसे कर वसूलने वाले शोषक बन जाएंगे, धर्म का पालन केवल बाह्य आडम्बर तक सीमित रह जाएगा, मनुष्यों की आयु व सहनशक्ति घटती जाएगी, छल-कपट व आपसी कलह बढ़ेगी, तथा सम्पत्ति ही सम्मान का एकमात्र आधार मानी जाएगी — यह भविष्यवाणी आज भी अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। इसके पश्चात् प्रलय के तीन प्रकारों का विवेचन है — नैमित्तिक प्रलय (ब्रह्मा के एक दिन के अंत में होने वाला आंशिक विनाश), प्राकृतिक प्रलय (ब्रह्मा के सम्पूर्ण जीवनकाल के अंत में होने वाला मौलिक विनाश, जब पंचमहाभूत भी अपने कारण में विलीन हो जाते हैं), तथा आत्यंतिक प्रलय (व्यक्तिगत जीवात्मा का परब्रह्म में अंतिम विलय, अर्थात् मोक्ष)। पुराण का समापन भगवान विष्णु की भक्ति की अपार महिमा तथा इस ग्रन्थ के श्रद्धापूर्वक श्रवण-पाठ से प्राप्त होने वाले पुण्य-फल के वर्णन से होता है।
विष्णु पुराण की सबसे विशिष्ट बात यह है कि यह सृष्टि, पालन व संहार — तीनों को भगवान विष्णु की ही एक लीला के रूप में प्रस्तुत करता है, न कि पृथक शक्तियों के रूप में। यही कारण है कि वैष्णव सम्प्रदाय में इसे सैद्धान्तिक दृष्टि से सर्वाधिक सुव्यवस्थित व प्रामाणिक पुराणों में गिना जाता है — यह न केवल भक्ति, अपितु ज्ञान (दार्शनिक तत्त्व-विवेचन), कर्म (वर्णाश्रम-धर्म) तथा इतिहास (वंशावलियां) — चारों दृष्टियों को एक साथ, एक सूत्र में, अत्यंत कुशलता से समेटे हुए है। ध्रुव के अटल संकल्प से लेकर प्रह्लाद की अडिग भक्ति तक, जड़ भरत के गहन वैराग्य से लेकर श्रीकृष्ण की अनंत लीलाओं तक — प्रत्येक कथा एक ही सत्य की ओर संकेत करती है : जो भगवान विष्णु के शरणागत होता है, काल व कर्म की कोई भी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकती।
(यह विष्णु पुराण का एक विस्तृत, किन्तु फिर भी प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों, उप-कथाओं व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्कृत-हिन्दी संस्करण का अवलोकन करें।)
