शिव पुराण भगवान शिव की महिमा, उनकी लीलाओं, तथा शैव दर्शन व भक्ति को समर्पित प्रमुख पुराण है। यह अनेक संहिताओं में विभक्त है — विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शतरुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता तथा वायवीय संहिता — जिनमें शिव-तत्त्व, उनकी लीलाएं व उपासना-विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है। पुराण का उपदेश स्वयं महर्षि व्यास द्वारा दिया गया माना जाता है, और यह शिव-भक्ति परम्परा का सर्वाधिक प्रामाणिक व विस्तृत आधार-ग्रन्थ माना जाता है।
इस पुराण की सबसे गहन व हृदयस्पर्शी कथाओं में से एक है — सती का आत्मदाह व दक्ष-यज्ञ-विध्वंस। प्रजापति दक्ष, जो शिव जी के श्वसुर थे, अपने ही जामाता से मनोमालिन्य रखते थे और उन्हें असभ्य, श्मशान-वासी, भूत-प्रेतों के स्वामी के रूप में तिरस्कृत मानते थे। एक विशाल यज्ञ का आयोजन करते समय दक्ष ने जानबूझकर शिव जी को आमंत्रित नहीं किया। सती, अपने पिता के घर बिना बुलाए जाने पर शिव जी द्वारा मना करने के बावजूद, पितृ-स्नेह व आग्रहवश यज्ञ में पहुंचीं, जहां पिता द्वारा अपने पति के प्रति किए गए अपमानजनक वचन सुनकर अत्यंत आहत व क्रोधित हुईं। अपमान सहन न कर सकने के कारण उन्होंने उसी यज्ञ-अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया। यह समाचार सुनते ही शिव जी का क्रोध प्रचण्ड रूप ले उठा — उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र नामक रौद्र गण तथा भद्रकाली नामक शक्ति उत्पन्न की, जिसने दक्ष के सम्पूर्ण यज्ञ को नष्ट कर, स्वयं दक्ष का भी सिर धड़ से अलग कर दिया। सती के शव को कंधे पर उठाकर शिव जी जब क्रोधावेश में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में घूमने लगे, तब सृष्टि के संतुलन को बचाने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को क्रमशः काट दिया, जो विभिन्न स्थानों पर गिरे — यही स्थान आज इक्यावन शक्तिपीठों के रूप में पूजे जाते हैं, जिनमें कामाख्या (असम), कालीघाट (कोलकाता) व ज्वालामुखी (हिमाचल) जैसे प्रमुख पीठ सम्मिलित हैं। बाद में ब्रह्मा जी व अन्य देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने दक्ष को पुनर्जीवित किया, किन्तु उनका मूल सिर न मिलने के कारण एक बकरे का सिर लगाकर उन्हें जीवनदान दिया — दक्ष ने अंततः अपनी भूल स्वीकार कर शिव जी की स्तुति की।
कालांतर में सती ने ही पर्वतराज हिमावन व उनकी पत्नी मेना की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया, और बाल्यकाल से ही शिव जी को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प लेकर अत्यंत कठोर तपस्या आरम्भ कर दी — वे केवल बिल्वपत्र खाकर, फिर केवल जल पीकर, और अंततः निराहार रहकर भी तप करती रहीं, जिस कारण उन्हें "अपर्णा" (पत्ते तक न खाने वाली) नाम प्राप्त हुआ। उधर तारकासुर नामक असुर, जिसने ब्रह्मा जी से यह वर प्राप्त किया था कि केवल शिव-पुत्र ही उसका वध कर सके, तीनों लोकों पर अपना आतंक फैला चुका था — किन्तु शिव जी तो गहन समाधि में लीन थे, सती-वियोग से विरक्त होकर संसार से दूर। देवताओं ने कामदेव को शिव जी में पार्वती के प्रति आसक्ति जगाने हेतु भेजा। कामदेव ने जैसे ही अपना पुष्प-बाण शिव जी पर चलाया, समाधि भंग होने से क्रुद्ध शिव जी ने अपना तृतीय नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया — इसी कारण कामदेव "अनंग" (शरीर-रहित) कहलाए, और उनकी पत्नी रति के विलाप पर शिव जी ने बाद में उन्हें भाव-रूप (बिना स्थूल शरीर के, केवल भावना के रूप में) जीवित रहने का वरदान भी दिया। किन्तु पार्वती की अविचल तपस्या व निष्ठा से अंततः प्रसन्न होकर शिव जी ने सप्तर्षियों के माध्यम से उनकी परीक्षा ली, और अंततः स्वयं वृद्ध ब्राह्मण के वेश में प्रकट होकर, शिव की निंदा कर उनकी निष्ठा परखी — जब पार्वती ने इस निंदा पर भी अविचलित रहकर तप-त्याग का संकल्प प्रकट किया, तभी शिव जी ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर उन्हें स्वीकार किया। दोनों का भव्य विवाह हिमालय पर सम्पन्न हुआ, जिसमें स्वयं भगवान विष्णु ने पार्वती के भ्राता के रूप में कन्यादान किया, तथा शिव जी की भूत-प्रेत बारात को देखकर पार्वती की माता मेना मूर्छित हो गईं थीं, जिन्हें बाद में शिव जी के वास्तविक, सौम्य रूप का दर्शन कराकर शांत किया गया।
शिव-पार्वती के इस मिलन से कार्तिकेय (स्कन्द) का जन्म हुआ, जिन्हें छः कृत्तिका माताओं ने पालित किया — इसी कारण वे "षडानन" (छः मुख वाले) भी कहलाए — और उन्होंने देवताओं का सेनापति बनकर तारकासुर का वध किया। इसी पुराण में भगवान गणेश की भी प्रसिद्ध कथा आती है — पार्वती जी ने स्नान के समय द्वार-रक्षा हेतु अपने उबटन से एक बालक की रचना कर उसमें प्राण फूंके और उसे अपना पुत्र घोषित किया। उस बालक ने, न पहचानते हुए, स्वयं शिव जी को भी भीतर जाने से रोक दिया। क्रुद्ध शिव जी ने उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को सत्य ज्ञात हुआ तो उनके अपार शोक को देखकर शिव जी ने प्रतिज्ञा की कि उत्तर दिशा में जो भी प्राणी सबसे पहले मिलेगा, उसी का सिर बालक के धड़ पर लगाकर उसे पुनर्जीवित किया जाएगा — संयोगवश वह एक हाथी था, और इस प्रकार गणेश जी को गजमुख प्राप्त हुआ तथा उन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूज्य (अग्रपूजा का अधिकार) होने का वरदान भी मिला।
पुराण में भस्मासुर की कथा भी आती है — वृकासुर नामक एक असुर ने कठोर तप से शिव जी से यह वर प्राप्त किया कि वह जिस भी प्राणी के सिर पर हाथ रखे, वह तत्काल भस्म हो जाए। यह वर प्राप्त होते ही दुष्ट बुद्धि से उसने स्वयं शिव जी को ही भस्म करने का प्रयास किया। भयभीत शिव जी भागते हुए भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने मोहिनी का अत्यंत सुंदर रूप धारण कर भस्मासुर को नृत्य की प्रतियोगिता में उलझा दिया, और नृत्य की एक मुद्रा में स्वयं अपने ही सिर पर हाथ रखने हेतु उसे प्रेरित किया, जिससे वह असुर स्वयं अपने ही वर से भस्म हो गया — यह कथा सिखाती है कि अहंकार व दुरुपयोग से प्राप्त शक्ति अंततः स्वयं के ही विनाश का कारण बनती है।
पुराण में त्रिपुरासुर-वध की कथा भी आती है — तीन असुर-पुत्रों द्वारा निर्मित तीन अजेय, उड़ने वाले नगरों (त्रिपुर, स्वर्ण, रजत व लौह के बने) का संहार स्वयं शिव जी ने एक ही बाण से किया, जिस हेतु स्वयं ब्रह्मा जी को उनका सारथी बनना पड़ा, पृथ्वी को रथ तथा सूर्य-चन्द्र को रथ-चक्र बनाया गया, और समस्त देवताओं को अपने-अपने अस्त्र-तेज से उस एक बाण में समाहित होना पड़ा — इसी कारण शिव जी को "त्रिपुरारि" भी कहा जाता है। अंधकासुर नामक एक अन्य असुर, जो वास्तव में शिव जी के ही एक अंश से उत्पन्न हुआ था किन्तु अहंकारवश पार्वती को ही हरने का प्रयास करने लगा, का भी संहार शिव जी के द्वारा वर्णित है। रावण द्वारा कैलास पर्वत को उठाने के दुस्साहस की कथा भी इस पुराण में आती है — अहंकारी रावण ने एक बार अपनी शक्ति दिखाने हेतु सम्पूर्ण कैलास पर्वत को ही उठाने का प्रयास किया, जिस पर शिव जी ने अपने पैर के अंगूठे-मात्र के दबाव से पर्वत को यथास्थान स्थिर कर दिया, जिससे रावण की भुजाएं पर्वत के नीचे दब गईं — रावण ने तब सहस्र वर्षों तक शिव-स्तुति (जो आगे "शिव तांडव स्तोत्र" के नाम से प्रसिद्ध हुई) गाकर शिव जी को प्रसन्न किया, जिससे मुक्त होकर उसे चन्द्रहास नामक अजेय खड्ग भी वरदान में प्राप्त हुआ।
शिव पुराण में द्वादश ज्योतिर्लिंगों का भी विशेष वर्णन है — सोमनाथ (गुजरात), मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश), महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश), केदारनाथ (हिमालय), भीमाशंकर (महाराष्ट्र), काशी विश्वनाथ (वाराणसी), त्र्यम्बकेश्वर (नासिक), वैद्यनाथ (झारखंड), नागेश्वर (गुजरात), रामेश्वरम (तमिलनाडु) तथा घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र) — इन बारह दिव्य स्थलों पर शिव जी स्वयं ज्योति-स्वरूप में प्रकट हुए माने जाते हैं, और इनकी यात्रा व दर्शन को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। पुराण में शिव-सहस्रनाम, रुद्राक्ष-धारण का महत्व (एक मुखी से लेकर चौदह मुखी रुद्राक्ष तक प्रत्येक के पृथक गुण-धर्म), भस्म-धारण का रहस्य (जो वैराग्य व मृत्यु की अनिवार्यता के स्मरण का प्रतीक है), तथा महाशिवरात्रि व्रत की विधि व महिमा का भी विस्तृत वर्णन मिलता है, साथ ही नन्दी (शिव जी के वाहन, जो धर्म के प्रतीक भी माने जाते हैं) की उत्पत्ति-कथा का भी इसमें उल्लेख है।
शिव पुराण की यह विशेषता है कि यह शिव जी के दो परस्पर-विरोधाभासी किन्तु पूरक स्वरूपों को एक साथ प्रस्तुत करता है — एक ओर वैरागी, श्मशान-वासी, गहन तपस्वी महादेव, तो दूसरी ओर पार्वती के प्रेमल पति, कार्तिकेय-गणेश के वात्सल्यपूर्ण पिता — यही दर्शाता है कि सच्चा वैराग्य व सच्चा प्रेम परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं, और भस्मासुर व रावण जैसी कथाओं के माध्यम से यह भी सिखाता है कि अनुचित रूप से प्राप्त शक्ति अथवा अहंकार का दुरुपयोग अंततः स्वयं के ही पतन की ओर ले जाता है, जबकि विनम्र समर्पण (जैसा रावण ने अंततः किया) भगवान की कृपा का द्वार खोल देता है।
(यह शिव पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त संहिताओं, अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
