पुराण १८

ब्रह्माण्ड पुराण

ब्रह्माण्ड पुराण अठारह महापुराणों में अंतिम, किन्तु आकार में सर्वाधिक विस्तृत पुराणों में से एक माना जाता है, और इसका नाम "ब्रह्माण्ड" — अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति के मूल में स्थित विराट ब्रह्माण्डीय अण्ड (कॉस्मिक एग) — की अवधारणा से लिया गया है, जो इस पुराण की केन्द्रीय, मौलिक दार्शनिक नींव है। परम्परा के अनुसार इसमें बारह सहस्र श्लोक हैं। पुराण का आरम्भ अत्यंत गहन सृष्टि-विज्ञान से होता है — इसके अनुसार, सृष्टि के आरम्भ में, जब कुछ भी प्रकट नहीं था, सर्वप्रथम परमात्मा की इच्छा से एक विराट, स्वर्णिम, तेजोमय अण्ड (हिरण्यगर्भ अथवा ब्रह्माण्ड) प्रकट हुआ, जो आदि-जल में निरंतर तैरता रहा। एक सहस्र दिव्य वर्षों तक यह अण्ड उस जल में तैरता रहा, और तदन्तर इसी अण्ड के भीतर ही स्वयं भगवान ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने इसी अण्ड के भीतर ही सम्पूर्ण लोकों (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक आदि सप्त लोक), सात समुद्रों, सप्तद्वीपों (जम्बूद्वीप आदि), मेरु पर्वत व अन्य समस्त पर्वतों, तथा समस्त चराचर प्राणियों की रचना की। यह अण्ड अपने आप में ही सम्पूर्ण दृश्यमान ब्रह्माण्ड का प्रतीक, आवरण व आधार माना जाता है — बाहर से सात आवरणों (जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत् व प्रकृति) से घिरा यह अण्ड, मानो सम्पूर्ण प्रकट सृष्टि की एक सुरक्षा-कवच है। यही अवधारणा आगे चलकर भारतीय सृष्टि-दर्शन का एक मूल, अपरिहार्य स्तम्भ बनी, और "ब्रह्माण्ड" शब्द स्वयं आज भी सम्पूर्ण विश्व-रचना के पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त होता है। इस पुराण की एक अत्यंत महत्वपूर्ण व दुर्लभ विशेषता यह है कि इसके ललितोपाख्यान नामक भाग में ललिता सहस्रनाम सम्मिलित माना जाता है — देवी ललिता (त्रिपुरसुंदरी) के एक हजार दिव्य नामों का यह अत्यंत पवित्र स्तोत्र श्री विद्या (शाक्त) उपासना-परम्परा का एक केन्द्रीय, अपरिहार्य ग्रन्थ है। कथा के अनुसार, जब भण्डासुर नामक असुर के अत्याचार से त्रस्त देवताओं ने देवी की शरण ली, तब देवी ललिता ने एक विशाल यज्ञ-कुण्ड से स्वयं प्रकट होकर उस असुर व उसकी सम्पूर्ण असुर-सेना का संहार किया, और इसी विजय के पश्चात देवताओं के अनुरोध पर भगवान हयग्रीव (भगवान विष्णु का अश्वमुख, ज्ञान के अधिष्ठाता अवतार) ने महर्षि अगस्त्य को देवी के एक-एक हजार नामों का यह दिव्य स्तोत्र उपदेश के रूप में प्रदान किया। ललिता सहस्रनाम में देवी के प्रत्येक नाम में गहन तांत्रिक, दार्शनिक व योगिक रहस्य समाहित माने जाते हैं, और इसे शाक्त उपासकों द्वारा नित्य पाठ हेतु अत्यंत पवित्र, सिद्ध व शक्तिशाली स्तोत्र माना जाता है, जिसका पाठ आज भी समस्त भारत में, विशेषकर दक्षिण भारत में, अत्यंत श्रद्धा से किया जाता है। इसी के साथ देवी के श्रीचक्र-यंत्र की उपासना-विधि का भी संक्षिप्त उल्लेख इस पुराण में मिलता है, जो श्री विद्या परम्परा की तांत्रिक साधना का केन्द्रीय प्रतीक है — श्रीचक्र को नौ त्रिकोणों से निर्मित माना जाता है, जिनका केन्द्र-बिन्दु स्वयं देवी ललिता का निवास-स्थान माना जाता है। इसी प्रकार इस पुराण से अध्यात्म रामायण का भी घनिष्ठ सम्बन्ध माना जाता है — यह भगवान श्रीराम की कथा का एक विशिष्ट, अत्यंत दार्शनिक व अद्वैत-वेदांत-प्रधान संस्करण है, जिसका कथन स्वयं भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को सुनाया गया माना जाता है। इसमें श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम मात्र नहीं, अपितु साक्षात् परब्रह्म, निर्गुण-निराकार सत्य के साकार रूप में प्रस्तुत किया गया है, और प्रत्येक घटना के पीछे गूढ़ आध्यात्मिक संकेत खोजे गए हैं — जैसे सीता-हरण को माया के आकर्षण व जीवात्मा के भ्रम में पड़ने का प्रतीक, वनवास को साधक के आत्म-अन्वेषण की कठिन यात्रा का प्रतीक, तथा राम-रावण युद्ध को आत्मा व अहंकार (रावण के दस सिर, जो दस इन्द्रियों व अहंकार के प्रतीक माने जाते हैं) के मध्य के चिरंतन संघर्ष के प्रतीक रूप में देखा गया है — यह संस्करण रामायण की कथा को भक्ति व दर्शन — दोनों के स्तर पर एक साथ पढ़ने की एक अद्भुत परम्परा स्थापित करता है, तथा इसमें राम-नाम के जप की महिमा पर भी विशेष बल दिया गया है, यह बताते हुए कि राम-नाम स्वयं राम से भी बड़ा फल देने वाला है, क्योंकि राम ने स्वयं अहिल्या जैसे एक ही पापी का उद्धार किया, जबकि राम-नाम असंख्य पापियों का उद्धार करता है। पुराण में इसके अतिरिक्त भौगोलिक वर्णन का भी विशेष महत्व है — सप्तद्वीप (जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक व पुष्कर द्वीप), मेरु पर्वत (जिसे सृष्टि की धुरी माना जाता है), विभिन्न वर्षों (भारतवर्ष सहित नव वर्षों) व उनकी नदियों-पर्वतों का विस्तृत वर्णन यहां मिलता है, जो प्राचीन भारतीय भूगोल व विश्व-रचना की अवधारणा को समझने हेतु महत्वपूर्ण स्रोत है। साथ ही चौदह मन्वन्तरों का क्रमबद्ध विवेचन, सूर्यवंश-चन्द्रवंश की संक्षिप्त वंशावली, तथा विभिन्न तीर्थों व व्रतों का भी विवेचन इसमें मिलता है। महर्षि पराशर (वेदव्यास के पिता) द्वारा अपने पुत्र मैत्रेय को दिया गया एक गहन दार्शनिक उपदेश भी इस पुराण का एक उल्लेखनीय, महत्वपूर्ण भाग माना जाता है, जिसमें सृष्टि, काल, धर्म व मोक्ष के गूढ़ रहस्यों का विवेचन है, तथा यह भी बताया गया है कि किस प्रकार ज्ञान व भक्ति — दोनों मार्गों के समन्वय से ही साधक परम सत्य तक पहुंच सकता है। पुराण में वायु-पुराण से मिलती-जुलती कुछ सामग्री भी पाई जाती है, जिस कारण कुछ विद्वान इन दोनों पुराणों के मध्य घनिष्ठ ऐतिहासिक सम्बन्ध मानते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण की यह विशेषता है कि यह, अठारहवें व अंतिम पुराण के रूप में, मानो सम्पूर्ण पुराण-परम्परा का ही एक व्यापक, समृद्ध संश्लेषण प्रस्तुत करता है — एक ओर यह सृष्टि के मूल कॉस्मिक रहस्य (ब्रह्माण्ड-अण्ड) को उजागर करता है, तो दूसरी ओर देवी-उपासना (ललिता सहस्रनाम के माध्यम से शाक्त परम्परा) व विष्णु-उपासना (अध्यात्म रामायण के माध्यम से वैष्णव परम्परा) — दोनों महान परम्पराओं को भी अत्यंत सामंजस्यपूर्ण ढंग से अपने भीतर समाहित करता है। यह दर्शाते हुए कि अठारह महापुराणों की यह सम्पूर्ण यात्रा — ब्रह्म पुराण से आरम्भ होकर ब्रह्माण्ड पुराण तक — अंततः एक ही सनातन सत्य की विविध, समृद्ध, परस्पर-पूरक अभिव्यक्तियां हैं, जो विभिन्न मार्गों से एक ही परमात्मा की ओर ले जाती हैं। (यह ब्रह्माण्ड पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त खण्डों, अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)