पुराण १७

गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण का कथन स्वयं भगवान विष्णु द्वारा अपने वाहन, पक्षिराज गरुड़ जी को दिए गए उपदेश के रूप में हुआ है, और यह अठारह पुराणों में व्यावहारिक रूप से सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला ग्रन्थ है — विशेषकर मृत्यु, परलोक-यात्रा व अंत्येष्टि-संस्कारों सम्बन्धी इसके विस्तृत वर्णन के कारण, जिसने इसे सामान्य हिन्दू गृहस्थ-जीवन में सर्वाधिक सुना जाने वाला पुराण बना दिया है। परम्परा के अनुसार इसमें उन्नीस सहस्र श्लोक हैं, तथा यह पूर्व खण्ड व उत्तर खण्ड (जो "प्रेत कल्प" के नाम से प्रसिद्ध है) — दो भागों में विभक्त है। इस पुराण का वह भाग जिसे "प्रेत कल्प" कहा जाता है, मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा का अत्यंत विस्तृत व गहन वर्णन प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार, मृत्यु के समय ही यमदूत आत्मा को ग्रहण करने आते हैं, और आत्मा को सूक्ष्म शरीर (जो अंगुष्ठ-मात्र आकार का माना जाता है) में यमलोक की ओर एक लम्बी, कष्टप्रद यात्रा पर ले जाते हैं — इस यात्रा में सोलह प्रमुख पड़ाव/नगर आते हैं, जिनमें से होकर आत्मा को गुजरना पड़ता है, तथा प्रतिवर्ष परिजनों द्वारा किए जाने वाले मासिक श्राद्ध-कर्म इन्हीं सोलह पड़ावों में आत्मा की सहायता हेतु निर्धारित माने जाते हैं। यमलोक पहुंचने पर यमराज के समक्ष आत्मा के जीवनभर के समस्त कर्मों का सम्पूर्ण लेखा-जोखा प्रस्तुत होता है — चित्रगुप्त, जो यमराज के परम सतर्क लेखापाल माने जाते हैं, प्रत्येक जीव के प्रत्येक शुभ व अशुभ कर्म का सूक्ष्मतम विवरण एक दिव्य पुस्तक में अंकित रखते हैं, जिसके आधार पर कर्मों का न्याय-पूर्ण निर्णय किया जाता है। इसी निर्णय के आधार पर आत्मा को या तो स्वर्ग के भिन्न-भिन्न लोकों में, अथवा अपने पापों के अनुरूप इकत्तीस नरकों में से किसी एक अथवा अनेक में भेजा जाता है — पुराण में रौरव (मिथ्या बोलने वालों हेतु), कुम्भीपाक (हिंसक प्राणियों हेतु), कालसूत्र (कृतघ्न पुरुषों हेतु), असिपत्रवन (धर्म-विरोधियों हेतु), तथा तामिस्र व अंधतामिस्र (धोखेबाजों हेतु) आदि नरकों का विस्तृत वर्णन है, जहां प्रत्येक नरक किसी विशिष्ट प्रकार के पाप (हत्या, चोरी, असत्य, कृतघ्नता आदि) के अनुरूप विशिष्ट, सांकेतिक दण्ड-व्यवस्था रखता है। यह सम्पूर्ण वर्णन सांकेतिक रूप में यह सिखाता है कि प्रत्येक कर्म का अनिवार्य फल भोगना ही पड़ता है, चाहे वह इसी जन्म में हो अथवा अगले, तथा दण्ड की यह अवधि भी शाश्वत नहीं — नरक-भोग के पश्चात् आत्मा पुनः नवीन जन्म की ओर अग्रसर होती है, अपने शेष कर्म-संचय के अनुरूप। इसी कारण पुराण में श्राद्ध व पिण्डदान के महत्व पर अत्यंत विशेष बल दिया गया है — मृत्यु के पश्चात परिजनों द्वारा किए गए पिण्डदान व तर्पण से ही आत्मा को यमलोक की इस कठिन, दीर्घ यात्रा में बल, शांति व सहायता प्राप्त होती है, तथा उचित विधि से किया गया श्राद्ध आत्मा को प्रेत-योनि से मुक्त कर पितृ-लोक में सम्मानजनक स्थान प्रदान करता है। यही कारण है कि परिवार में किसी की मृत्यु के पश्चात — परम्परागत रूप से ग्यारहवें, बारहवें अथवा तेरहवें दिन — गरुड़ पुराण के इसी "प्रेत कल्प" भाग का पाठ करवाने की प्रथा आज भी समस्त भारत में प्रचलित है, ताकि परिजन मृत्यु व परलोक की इस गहन प्रक्रिया को भली-भांति समझकर अपने कर्तव्यों (पिण्डदान, तर्पण, दान) का समुचित पालन कर सकें, तथा शोक की घड़ी में भी ज्ञान व धैर्य धारण कर सकें। पुराण में गरुड़ पक्षी की स्वयं की उत्पत्ति की कथा भी वर्णित है — विनता व कद्रू के मध्य हुई प्रतिस्पर्धा में विनता के दासत्व में पड़ जाने पर, उनके पुत्र गरुड़ ने नागों (कद्रू-पुत्रों) की सेवा कर अमृत लाकर मां को दासत्व से मुक्त कराया, तथा इसी सेवा-भाव से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन व ध्वज-चिह्न बनाया। इसके अतिरिक्त पुराण में सामान्य धर्मशास्त्र — वर्णाश्रम-धर्म, दान-विधि, विभिन्न व्रतों (जैसे एकादशी) का विस्तृत वर्णन — भी सम्मिलित है। आयुर्वेद सम्बन्धी संक्षिप्त किन्तु उपयोगी सामग्री (रोग व औषधि सम्बन्धी बुनियादी जानकारी), तथा रत्न-परीक्षा (हीरा, मोती, मणि, पुखराज आदि विभिन्न रत्नों की पहचान, उनके गुण-दोष व शुभ-अशुभ प्रभाव, तथा किस ग्रह हेतु कौन सा रत्न धारण करना चाहिए) पर भी इसमें एक पृथक, विशेष अनुभाग मिलता है, जो इसे केवल मृत्यु-सम्बन्धी ग्रन्थ न रहने देकर व्यावहारिक जीवन-ज्ञान का भी स्रोत बनाता है। विष्णु के विभिन्न अवतारों की संक्षिप्त कथाएं, मंत्र-शास्त्र की कुछ सामग्री, तथा भगवान विष्णु की उपासना-विधि का भी इसमें वर्णन है। पुराण के उत्तरार्ध में, जिसे "प्रेत कल्प" से अलग करते हुए अधिक दार्शनिक माना जाता है, आत्म-ज्ञान, वेदांत के मूल सिद्धांतों (आत्मा-ब्रह्म का अभेद, माया का स्वरूप), योग के विभिन्न मार्गों, तथा मोक्ष-प्राप्ति के उपायों का भी गहन दार्शनिक विवेचन मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि मृत्यु व परलोक का यह सम्पूर्ण विस्तृत वर्णन अंततः इसी उच्च उद्देश्य से किया गया है कि मनुष्य जीवन की नश्वरता व अनित्यता को भली-भांति समझकर धर्माचरण, सत्कर्म व आत्म-कल्याण की ओर प्रवृत्त हो — न कि केवल भय उत्पन्न करने हेतु। इसमें पुनर्जन्म के सिद्धांत व विभिन्न योनियों में जन्म लेने के कारणों का भी विवेचन मिलता है, तथा यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य-योनि ही मोक्ष-प्राप्ति हेतु सर्वाधिक उपयुक्त है, अतः इस दुर्लभ अवसर को सत्कर्मों में लगाना ही बुद्धिमत्ता है। गरुड़ पुराण की यह विशेषता है कि यह मृत्यु जैसे विषय को, जिससे सामान्यतः मनुष्य भयभीत व विमुख रहता है, अत्यंत स्पष्टता, ईमानदारी व व्यवस्थित ढंग से सम्मुख रखता है — यह सिखाते हुए कि मृत्यु से भयभीत होने अथवा उससे मुंह मोड़ने के स्थान पर, जीवित रहते हुए ही सत्कर्म, दान व धर्माचरण द्वारा अपने परलोक को सुगम बनाना, तथा अपने कर्मों के प्रति सदा सचेत रहना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है। (यह गरुड़ पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)