पुराण १६

मत्स्य पुराण

मत्स्य पुराण अठारह महापुराणों में सबसे प्राचीन पुराणों में से एक माना जाता है, और इसका नाम भगवान विष्णु के प्रथम दशावतार — मत्स्य (मीन) — के नाम पर पड़ा है। इस पुराण का कथन स्वयं भगवान मत्स्य द्वारा वैवस्वत मनु को, महाप्रलय के दौरान, दिए गए उपदेश के रूप में हुआ है — यह हिन्दू परम्परा की प्रसिद्ध जलप्लावन-कथा है, जो विश्व की अनेक अन्य संस्कृतियों की जलप्लावन-कथाओं से भी आश्चर्यजनक समानता रखती है। परम्परा के अनुसार इसमें चौदह सहस्र श्लोक हैं। कथा के अनुसार, एक दिन द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत (जो आगे चलकर वैवस्वत मनु, अर्थात् वर्तमान मन्वन्तर के मनु, कहलाए) कृतमाला नदी में संध्या-वन्दन हेतु जलांजलि दे रहे थे, तभी उनकी अंजलि में एक अत्यंत छोटी, किन्तु असाधारण रूप से तेजस्वी मछली आ गई। मछली ने करुण, मानवीय स्वर में उनसे प्रार्थना की कि संसार में बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को निगल जाती हैं, अतः वह उसे बड़ी मछलियों के भय से बचाने हेतु अपने साथ रख लें। दयालु राजा ने उसे एक छोटे कमण्डल में रख लिया, किन्तु मछली अद्भुत रूप से अत्यंत शीघ्रता से बढ़ने लगी — एक ही रात्रि में वह कमण्डल को भर गई। राजा ने उसे क्रमशः बड़े घड़े में, फिर सरोवर में, फिर नदी में स्थानांतरित किया, किन्तु मछली हर बार और भी अधिक विशाल होती चली गई, अंततः राजा को उसे समुद्र में ही छोड़ना पड़ा, जहां भी वह पर्वताकार होती चली गई। राजा को आश्चर्य व संदेह हुआ कि यह कोई साधारण मछली नहीं, अपितु स्वयं भगवान का ही कोई रूप है, और उन्होंने हाथ जोड़कर उस दिव्य मीन से उसके वास्तविक स्वरूप के विषय में प्रश्न पूछा। तब मत्स्य-रूपधारी भगवान विष्णु ने प्रकट होकर बताया कि आज से ठीक सात दिनों में एक भीषण प्रलय आने वाला है, जिसमें अनवरत वर्षा व समुद्र के उफान से सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी, और सारी सृष्टि एक विशाल जल-राशि में विलीन हो जाएगी। अतः राजा सत्यव्रत को तत्काल एक विशाल, दृढ़ नौका का निर्माण करवाना चाहिए, और उसमें सप्तर्षियों (मरीचि आदि), समस्त औषधियों व वनस्पतियों के बीजों, समस्त प्रकार के जीवों के एक-एक युगल, तथा चारों वेदों को सुरक्षित रूप से रखकर प्रलय की प्रतीक्षा करनी चाहिए — यह सुनिश्चित करते हुए कि सृष्टि के पुनर्निर्माण हेतु आवश्यक समस्त बीज किसी भी प्रकार नष्ट न हों। एक प्रसंग के अनुसार, इसी प्रलय-काल में हयग्रीव नामक असुर ने ब्रह्मा जी से वेदों का हरण कर उन्हें रसातल में छिपा दिया था, जिन्हें भगवान मत्स्य ने ही अपने इसी अवतार में हयग्रीव का वध कर पुनः उद्धार किया। जब सात दिन पश्चात् वास्तव में अनवरत वर्षा व समुद्री उफान से प्रलय-जल ने सम्पूर्ण पृथ्वी को डुबो दिया, तब भगवान मत्स्य, जो अब सहस्रों योजन विस्तार वाला विशालकाय रूप धारण कर चुके थे, एक स्वर्ण-सदृश सींग के साथ स्वयं प्रकट हुए। राजा ने नौका को वासुकि नाग को रस्सी बनाकर भगवान के उस सींग से दृढ़तापूर्वक बांध दिया, और भगवान मत्स्य ने उस नौका को सम्पूर्ण प्रलय-काल में, भीषण तूफानी व विक्षुब्ध जल-राशि के मध्य से, अत्यंत स्थिरता व सुरक्षा के साथ खींचते हुए अंततः हिमालय की सर्वोच्च चोटियों में से एक पर ला टिकाया, जहां नौका को एक वृक्ष से सुरक्षित रूप से बांध दिया गया — इसी स्थान को परवर्ती परम्परा में "नौबंधन" भी कहा गया, जिसे कुछ विद्वान वर्तमान हिमालय के किसी विशिष्ट शिखर से जोड़ते हैं। इस प्रकार सृष्टि के बीज सुरक्षित रहे, और प्रलय के जल के धीरे-धीरे उतरने के पश्चात् पुनः सृष्टि का क्रम आरम्भ हो सका, तथा राजा सत्यव्रत ही आगे चलकर वर्तमान सृष्टि के समस्त मानव-वंश के आदि-पुरुष, वैवस्वत मनु, बने। इसी यात्रा के दौरान, जब नौका विशाल, भयावह जल-राशि के मध्य डगमगाती रही, भगवान मत्स्य ने राजा सत्यव्रत को निरंतर सम्पूर्ण वेद-ज्ञान, सांख्य-योग, आत्म-तत्त्व, सृष्टि-रचना तथा धर्म का गहन उपदेश दिया, जो इस पुराण की मूल विषय-वस्तु है — यह दर्शाते हुए कि प्रलय के भयावह काल में भी, जब सम्पूर्ण बाह्य जगत विनाश के कगार पर हो, ज्ञान व धर्म का प्रकाश ही एकमात्र स्थिर सहारा होता है। मत्स्य पुराण अपनी अत्यंत विस्तृत व प्रामाणिक राजवंशावलियों हेतु भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है — सूर्यवंश (इक्ष्वाकु से प्रारम्भ होकर रामायण-कालीन राजाओं तक) व चन्द्रवंश (ययाति से प्रारम्भ होकर महाभारत-कालीन राजाओं तक) का क्रमबद्ध, विस्तृत वर्णन यहां विष्णु पुराण व भागवत पुराण के समान ही विस्तार से मिलता है, जिस कारण आधुनिक इतिहासकार व पुरातत्वविद् प्राचीन भारतीय कालक्रम व राजवंशों के अध्ययन हेतु इसे एक अत्यंत मूल्यवान स्रोत मानते हैं। इसके साथ ही यह पुराण मंदिर-निर्माण, प्रतिमा-निर्माण व मूर्तिकला (शिल्पशास्त्र) पर भी असाधारण रूप से विस्तृत व तकनीकी सामग्री प्रस्तुत करता है — नागर, द्रविड़ व वेसर शैलियों के मंदिरों की वास्तु-रचना, उनके विभिन्न अनुपात, गर्भगृह व शिखर के निर्माण-सिद्धांत, तथा विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के निर्माण हेतु आवश्यक माप व मुद्राओं का वर्णन यहां अत्यंत बारीकी से किया गया है, जिस कारण प्राचीन व मध्यकालीन भारतीय मंदिर-स्थापत्य कला के अध्ययन हेतु भी यह एक प्रमुख, अपरिहार्य आधार-ग्रन्थ माना जाता है। पुराण में दान-धर्म का भी विस्तृत वर्णन मिलता है — सोलह महादानों (जिनमें गौ-दान, भूमि-दान, तुलापुरुष-दान आदि सम्मिलित हैं) की विधि व महत्व का वर्णन, तथा विभिन्न व्रतों (विशेषकर मत्स्य-द्वादशी व्रत) व तीर्थ-माहात्म्य का भी विवेचन इसमें मिलता है। मन्वन्तरों की संख्या व उनके क्रमिक स्वरूप का भी विस्तृत वर्णन इस पुराण में प्राप्त होता है, जो सृष्टि के चक्रीय स्वरूप को समझने हेतु एक महत्वपूर्ण स्रोत है, तथा नरसिंह व वराह अवतारों का भी संक्षिप्त उल्लेख इसमें मिलता है, जो इसे दशावतार-परम्परा से भी जोड़ता है। मत्स्य पुराण की यह विशेषता है कि यह सृष्टि के विनाश व पुनर्जन्म — दोनों को एक साथ, एक ही कथा में समेटते हुए यह गहन संदेश देता है कि चाहे कितना भी बड़ा प्रलय क्यों न आए, धर्म, ज्ञान व जीवन का बीज सदा सुरक्षित रहता है, यदि श्रद्धा व समर्पण के साथ परमात्मा की शरण ली जाए — भगवान स्वयं, चाहे कितने भी भयावह संकट के मध्य हो, अपने शरणागत भक्त की रक्षा करने हेतु सदा तत्पर रहते हैं। (यह मत्स्य पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)