कूर्म पुराण भगवान विष्णु के कूर्म (कच्छप) अवतार को समर्पित प्रमुख पुराण है, और इसका कथन स्वयं भगवान विष्णु द्वारा कूर्म-रूप में ऋषि इन्द्रद्युम्न को सुनाया गया उपदेश माना जाता है। परम्परा के अनुसार इसमें सत्रह सहस्र श्लोक हैं, तथा यह पुराण शैव व वैष्णव — दोनों परम्पराओं का एक दुर्लभ समन्वय प्रस्तुत करता है।
इस पुराण की केन्द्रीय कथा है — समुद्र-मन्थन। एक बार ऋषि दुर्वासा के शाप से देवता अपनी समस्त शक्ति, ऐश्वर्य व ओज से हीन हो गए, जिससे असुरों ने स्वर्ग पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों के साथ अस्थायी संधि कर क्षीरसागर का मन्थन करने का निश्चय किया, जिससे अमृत प्राप्त कर पुनः अपनी शक्ति प्राप्त की जा सके। मन्दराचल पर्वत को मन्थन-दण्ड तथा वासुकि नाग को मन्थन-रज्जु बनाया गया — देवताओं ने वासुकि की पूंछ व असुरों ने उसके मुख की ओर पकड़ा। किन्तु मन्दराचल अत्यंत भारी होने के कारण समुद्र के तल में डूबने लगा, जिससे मन्थन असम्भव हो गया। इसी संकट के समाधान हेतु भगवान विष्णु ने विशालकाय कूर्म का रूप धारण कर समुद्र के तल में प्रवेश किया, और मन्दराचल पर्वत को अपनी विशाल, दृढ़ पीठ पर आधार प्रदान किया, जिससे मन्थन निर्बाध रूप से चल सका।
सहस्र वर्षों तक चले इस मन्थन से क्रमशः चौदह रत्न प्रकट हुए — सर्वप्रथम कालकूट (हलाहल) विष प्रकट हुआ, जिसकी प्रचण्डता से सृष्टि भस्म हो जाने का भय उत्पन्न हुआ; तब भगवान शिव ने स्वयं उस विष को कंठ में धारण कर लिया, न निगला न त्यागा, जिस कारण वे नीलकंठ कहलाए — विष की उष्णता सहन न होने पर देवी पार्वती ने उनका कंठ दबाए रखा, जिससे विष वहीं रुक गया। इसके पश्चात् क्रमशः कामधेनु गौ; ऐरावत हाथी; उच्चैःश्रवा अश्व; कौस्तुभ मणि (जिसे स्वयं भगवान विष्णु ने अपने वक्षस्थल पर धारण किया); पारिजात वृक्ष; वारुणी (मद्य, जिसे असुरों ने ग्रहण किया); अप्सराएं; देवी लक्ष्मी, जो स्वयं भगवान विष्णु का वरण करने हेतु उनके वक्षस्थल पर आ विराजीं; चन्द्रमा, जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया; शंख; धनुष; तथा अंततः धन्वन्तरि, जो अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत प्रकट होते ही असुरों व देवताओं के मध्य उसे प्राप्त करने हेतु संघर्ष आरम्भ हो गया, जिसे शांत करने हेतु भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया, और कुशलतापूर्वक समस्त अमृत केवल देवताओं को ही पिला दिया, असुरों को छल से वंचित रखा — इसी प्रसंग में राहु-केतु की उत्पत्ति की कथा भी जुड़ी है, जहां स्वरभानु नामक असुर ने छल से देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत पी लिया, जिसे सूर्य-चन्द्र ने पहचान लिया और भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया — किन्तु अमृत पी चुके होने के कारण वह सिर (राहु) व धड़ (केतु) दोनों अमर रहे, और आज भी सूर्य-चन्द्र से प्रतिशोध हेतु उन्हें समय-समय पर ग्रसते हैं, जिससे ग्रहण की घटना होती है। मन्थन के पश्चात देवताओं व असुरों के मध्य पुनः भीषण युद्ध हुआ, जिसमें अमृत-बल से देवताओं ने निर्णायक विजय प्राप्त की।
इस पुराण में, कूर्म-अवतार की कथा के अतिरिक्त, एक बड़ा भाग ईश्वर-गीता नामक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक खण्ड को समर्पित है, जो भगवद्गीता की ही भांति शिव-भक्ति व ज्ञान-मार्ग का प्रतिपादन करता है। इसमें भगवान शिव स्वयं ऋषियों को आत्मा, ब्रह्म, योग व मोक्ष के गूढ़ रहस्यों का उपदेश देते हैं — यह बताते हुए कि आत्मा नित्य, निर्विकार व परब्रह्म से अभिन्न है, तथा अज्ञान ही बंधन का मूल कारण है, ज्ञान-प्राप्ति ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। यह उपदेश अष्टांग योग के विभिन्न अंगों — यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि — का भी विवेचन करता है, तथा यह स्पष्ट करता है कि ध्यान व समाधि के माध्यम से ही साधक आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है। यह खण्ड शैव व वैष्णव — दोनों परम्पराओं के समन्वय को दर्शाता है, यह प्रतिपादित करते हुए कि चाहे उपासना विष्णु की हो अथवा शिव की, अंतिम सत्य एक ही निर्गुण, निराकार परब्रह्म है।
पुराण में वाराणसी (काशी) के तीर्थ-माहात्म्य का विशेष वर्णन मिलता है — काशी को भगवान शिव की नित्य-निवास-स्थली तथा मोक्षदायिनी नगरी के रूप में वर्णित किया गया है, जिसे प्रलय में भी शिव जी अपने त्रिशूल पर धारण कर सुरक्षित रखते हैं। गया, प्रयाग व अन्य प्रमुख तीर्थ-स्थलों के विवरण, तथा पिण्डदान व श्राद्ध-कर्म की विधि का भी विस्तृत वर्णन इसमें प्राप्त होता है, जो पितृ-ऋण से मुक्ति हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके साथ ही हरिद्वार व कुरुक्षेत्र के माहात्म्य का भी संक्षिप्त उल्लेख इसमें मिलता है।
कूर्म पुराण में सृष्टि-विज्ञान, कल्प-मन्वन्तरों का विवेचन, तथा वर्णाश्रम-धर्म सम्बन्धी शिक्षाओं का भी विस्तार से वर्णन है। पुराण धर्म के साधारण (सबके लिए समान — सत्य, अहिंसा, दान, क्षमा) व विशेष (वर्ण-आश्रम के अनुसार भिन्न कर्तव्य) — दोनों रूपों का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है, तथा विभिन्न व्रतों, दान-विधियों व धर्माचरण सम्बन्धी शिक्षाओं का भी विस्तृत संकलन इसमें मिलता है। वर्ण व आश्रम के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्यों — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम की विधि व महत्व — का भी इसमें संक्षिप्त विवेचन मिलता है, तथा सांख्य-दर्शन के पच्चीस तत्वों का भी एक संक्षिप्त परिचयात्मक विवेचन इसमें प्राप्त होता है।
कूर्म पुराण की यह विशेषता है कि यह भगवान विष्णु के सबसे अदृश्य, किन्तु सबसे आधारभूत अवतार की महिमा गाता है — कूर्म किसी शत्रु का वध नहीं करते, वे केवल दृढ़ता से सम्पूर्ण सृष्टि के भार को सहन करते हैं, यह सिखाते हुए कि सच्ची दिव्यता सदा दृश्य व आकर्षक रूप में प्रकट नहीं होती — कभी-कभी वह मूक, अटूट सहनशीलता व धारण-क्षमता के रूप में भी प्रकट होती है, जिस पर सम्पूर्ण सृष्टि का संतुलन निर्भर करता है। साथ ही, ईश्वर-गीता के माध्यम से यह शिव व विष्णु भक्ति के मध्य के भेद को समाप्त कर एक समन्वित आध्यात्मिक दर्शन का आधार प्रदान करता है।
(यह कूर्म पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
