पुराण १४

वामन पुराण

वामन पुराण भगवान विष्णु के वामन (बौने ब्राह्मण) अवतार तथा दानवीर राजा बलि की अमर कथा को समर्पित प्रमुख पुराण है, जो दान, विनम्रता व सत्यनिष्ठा की सर्वोच्च महिमा का प्रतिपादन करता है। परम्परा के अनुसार इसमें दस सहस्र श्लोक हैं, और यद्यपि यह मुख्यतः वैष्णव कथा पर केन्द्रित है, इसमें शैव सामग्री का भी पर्याप्त समावेश है, जो इसे शैव-वैष्णव समन्वय का एक अनूठा ग्रन्थ बनाता है। राजा बलि, जो भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे, अपने पितामह के समान ही विष्णु-भक्त व अत्यंत धर्मपरायण थे, किन्तु साथ ही अपनी अद्वितीय दानशीलता व पराक्रम के बल पर उन्होंने देवराज इन्द्र को युद्ध में पराजित कर तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उनके गुरु शुक्राचार्य व असुर-सेना की सहायता से वे इतने शक्तिशाली हो गए कि स्वयं इन्द्र को भी स्वर्ग छोड़कर शरणागत होना पड़ा। देवताओं की व्याकुल प्रार्थना पर, तथा स्वयं माता अदिति के पुत्र-स्नेह व तपस्या से प्रेरित होकर, भगवान विष्णु ने अदिति के ही गर्भ से एक अत्यंत लघुकाय, तेजस्वी ब्राह्मण बालक — वामन — के रूप में अवतार लिया। राजा बलि उस समय नर्मदा-तट पर एक विशाल अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, जिसमें आगंतुकों को इच्छानुसार दान देने की प्रतिज्ञा ली गई थी। वामन भगवान ब्रह्मचारी के वेश में, हाथ में दण्ड-कमण्डल लिए, उस यज्ञ-स्थल पर पहुंचे। उनके अद्भुत तेज व आभा से सम्पूर्ण सभा चकित रह गई — उनके एक-एक पग से ही पृथ्वी कंपायमान होने लगी थी, जिसे सभी ने एक दिव्य संकेत के रूप में अनुभव किया। राजा बलि ने स्वयं उनका पाद्य-अर्घ्य से पूजन कर, उनसे इच्छित वस्तु मांगने का निवेदन किया। वामन भगवान ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक केवल अपने तीन पगों के बराबर भूमि दान में मांगी — इससे अधिक कुछ नहीं। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह पहचान लिया कि यह लघुकाय ब्राह्मण वास्तव में स्वयं भगवान विष्णु हैं, जो छल से बलि का सर्वस्व हर लेने आए हैं, और उन्होंने बलि को सावधान करते हुए यह दान न करने की सलाह दी, यहां तक कि स्वयं अपनी योग-शक्ति से जल-पात्र के छिद्र में प्रवेश कर जल-प्रवाह रोकने का भी प्रयास किया, जिसे भगवान वामन ने एक कुश से उस छिद्र को कुरेदकर विफल कर दिया, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख जाती रही। किन्तु राजा बलि ने यह उत्तर दिया कि चाहे यह स्वयं भगवान ही क्यों न हों, एक बार दिया वचन वापस लेना उनके कुल (प्रह्लाद के वंश) की परम्परा व स्वाभिमान के सर्वथा विरुद्ध है — भगवान स्वयं उनसे याचना करने आएं, इससे बढ़कर सौभाग्य भला और क्या हो सकता है। उन्होंने संकल्प-जल हाथ में लेकर दान की प्रतिज्ञा पूर्ण कर दी। इससे क्रुद्ध शुक्राचार्य ने बलि को नेत्रहीन हो जाने का शाप भी दे दिया, किन्तु बलि अपने निश्चय से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनकी पत्नी विन्ध्यावली ने भी इस दान-कार्य में जल-पात्र स्वयं अपने हाथों से उठाकर पूर्ण सहयोग दिया, जो यह दर्शाता है कि धर्मपरायण परिवार में पति-पत्नी दोनों ही समान निष्ठा से एक ही संकल्प के साथ खड़े होते हैं। दान स्वीकार होते ही भगवान वामन ने त्रिविक्रम (विराट) रूप धारण किया, जिनका एक ही चरण सम्पूर्ण पृथ्वी को तथा दूसरा चरण सम्पूर्ण आकाश व स्वर्गलोक को आच्छादित कर गया — इस विराट रूप को देखकर तीनों लोक भयाक्रांत व चकित हो उठे, तथा ब्रह्मा जी ने स्वयं अपने कमण्डल के जल से उनके उठे हुए चरण का प्रक्षालन किया, जो नीचे गिरते हुए आकाशगंगा (स्वर्ग-गंगा) बनी, जो आगे पृथ्वी पर गंगा नदी के रूप में अवतरित हुई। तीसरे पग हेतु अब कहीं भी स्थान शेष न रहने पर भगवान ने बलि से पूछा कि तीसरा पग कहां रखें — तब राजा बलि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना ही शीश आगे कर दिया। भगवान बलि की इस असाधारण दानशीलता, सत्यनिष्ठा व समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुए, और अपना चरण उनके मस्तक पर रखकर उन्हें पाताल-लोक भेज दिया — किन्तु साथ ही यह वरदान भी दिया कि पाताल में बलि का अखण्ड साम्राज्य रहेगा, वे स्वयं सदा उनके द्वार की रक्षा करेंगे, आगामी मन्वन्तर में बलि को स्वयं इन्द्र-पद प्राप्त होगा, तथा प्रतिवर्ष बलि को पृथ्वी पर अपनी प्रजा से मिलने आने का सौभाग्य प्राप्त होगा — केरल में मनाया जाने वाला ओणम पर्व आज भी राजा बलि की इसी वार्षिक पृथ्वी-यात्रा की स्मृति में मनाया जाता है, जहां प्रजा अपने प्रिय, न्यायप्रिय राजा के पुनरागमन का उत्सव हर्षोल्लास से मनाती है। इस पुराण में, यद्यपि यह मुख्यतः वैष्णव कथा पर केन्द्रित है, फिर भी भगवान शिव की महिमा व उपासना-विधि सम्बन्धी पर्याप्त सामग्री भी सम्मिलित है, जो इसे शैव व वैष्णव — दोनों परम्पराओं के मध्य एक सेतु का कार्य करने वाला अनूठा ग्रन्थ बनाती है। इसमें शिव-पार्वती विवाह की कथा का भी एक विस्तृत संस्करण मिलता है, तथा कार्तिकेय के जन्म व तारकासुर-वध का भी वर्णन है। इसके साथ ही विभिन्न व्रतों, तीर्थ-माहात्म्य (विशेषकर नर्मदा-तट के तीर्थों व प्रयाग के माहात्म्य, जहां गंगा-यमुना-सरस्वती के त्रिवेणी-संगम का वर्णन अत्यंत विस्तार से मिलता है) तथा सृष्टि-वर्णन सम्बन्धी सामग्री भी इसमें प्राप्त होती है। पुराण में सावित्री-सत्यवान की कथा का भी एक संस्करण मिलता है, तथा दान के विभिन्न प्रकारों — भूमि-दान, गौ-दान, अन्न-दान व विद्या-दान — के माहात्म्य का भी विस्तृत वर्णन है, जो राजा बलि की मूल कथा के साथ सामंजस्यपूर्ण रूप से जुड़ता है। अंधकासुर-वध की कथा का भी एक संक्षिप्त संस्करण इस पुराण में मिलता है, जो लिङ्ग पुराण की कथा से सामंजस्य रखता है। वामन पुराण की यह विशेषता है कि यह शक्ति व विनम्रता के मध्य के सम्बन्ध को अत्यंत गहनता से उजागर करता है — राजा बलि, अपार शक्ति व साम्राज्य रखते हुए भी, एक साधारण याचक के समक्ष अपना वचन निभाने हेतु सब कुछ त्याग देते हैं, और यही त्याग उन्हें भगवान का प्रिय भक्त व पाताल का अमर सम्राट बना देता है — यह सिखाते हुए कि सच्ची महानता शक्ति में नहीं, अपितु विनम्रता व वचन-निष्ठा में है। (यह वामन पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)