पुराण १३

स्कन्द पुराण

स्कन्द पुराण अठारह महापुराणों में सबसे विशाल पुराण है — परम्परागत मान्यता के अनुसार इसमें इक्यासी हजार से भी अधिक श्लोक हैं, जो इसे शेष सभी पुराणों से भी बड़ा बनाते हैं। यह पुराण भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) के नाम पर प्रसिद्ध है, किन्तु वास्तव में यह भारतवर्ष भर में फैले असंख्य तीर्थ-स्थलों के माहात्म्य का एक विराट, विश्वकोशीय संकलन है, जिसे शिव जी ने स्वयं कार्तिकेय को उपदेश-रूप में सुनाया माना जाता है। पुराण अनेक विशाल खण्डों में विभक्त है, जिनमें से प्रमुख हैं — काशी खण्ड (वाराणसी की महिमा पर केन्द्रित, जिसमें काशी को स्वयं भगवान शिव की नगरी व मोक्षदायिनी तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है — यहां मृत्यु होने पर स्वयं भगवान शिव तारक-मंत्र का उपदेश देकर जीव को सीधे मोक्ष प्रदान करते हैं, ऐसी मान्यता है, तथा मणिकर्णिका घाट के विषय में यह विशेष कथा है कि यहां स्वयं भगवान विष्णु ने तपस्या करते समय अपने स्वेद-जल से एक कुण्ड का निर्माण किया, जिसमें प्रसन्न होकर आए शिव जी का कुण्डल गिर गया — इसी कारण इसे मणिकर्णिका कहा गया, और इसी कारण काशी में मृत्यु को "मुक्ति" माना जाता है, न कि शोक का विषय), केदार खण्ड (हिमालय स्थित केदारनाथ व समीपवर्ती तीर्थों की महिमा, जहां पाण्डवों द्वारा महाभारत युद्ध के पश्चात ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति हेतु भगवान शिव को प्रसन्न करने की खोज की कथा भी वर्णित है — शिव जी ने बचने हेतु बैल का रूप धारण किया, किन्तु भीम द्वारा पहचान लिए जाने पर भूमि में समाधिस्थ हो गए, जिनकी पीठ के आकार में आज भी केदारनाथ का शिवलिंग पूजा जाता है, तथा उनके शेष अंग नेपाल के पशुपतिनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर व कल्पेश्वर में प्रकट हुए — इन पांचों स्थलों को सम्मिलित रूप से "पंच केदार" कहा जाता है), हिमालय खण्ड, रेवा खण्ड (नर्मदा नदी की महिमा व उसके उद्गम की कथा सहित — नर्मदा को गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है, क्योंकि इसके प्रत्येक कंकड़ को ही शिवलिंग-तुल्य पूज्य माना जाता है, जिन्हें "बाणलिंग" कहा जाता है), नागर खण्ड, प्रभास खण्ड (गुजरात स्थित सोमनाथ क्षेत्र की महिमा, जहां भगवान श्रीकृष्ण का देहावसान हुआ माना जाता है, तथा जहां चन्द्रदेव ने दक्ष के शाप से मुक्ति हेतु शिव जी की आराधना की थी — दक्ष ने अपनी सताईस पुत्रियों में से केवल रोहिणी के प्रति पक्षपात करने वाले चन्द्र को क्षयरोग का शाप दिया था, जिससे मुक्ति हेतु सोमनाथ में शिव-आराधना की गई, और चन्द्र को यह वरदान मिला कि वे कृष्ण-पक्ष में क्षीण होकर शुक्ल-पक्ष में पुनः पूर्ण हो जाएंगे — इसी कारण चन्द्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती हैं), तथा वैष्णव खण्ड — इन सभी में भारत के कोने-कोने में स्थित सैकड़ों तीर्थों, उनकी उत्पत्ति-कथाओं व यात्रा-विधि का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। स्कन्द पुराण में भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथा का भी विस्तृत वर्णन है। तारकासुर नामक असुर के आतंक से त्रस्त देवताओं को यह ज्ञात था कि केवल शिव-पुत्र ही उसका वध कर सकता है। शिव जी के तेज को अग्निदेव ने धारण किया, किन्तु उसकी प्रचण्डता सहन न कर सकने पर गंगा जी में प्रवाहित कर दिया; गंगा ने उसे शरवण (सरकंडों के वन) में स्थापित किया, जहां छः कृत्तिका माताओं ने एक साथ उस दिव्य तेज से उत्पन्न छः शिशुओं का पालन किया — बाद में माता पार्वती ने स्नेहवश इन छहों को एक साथ गले लगाया, जिससे वे एक ही शरीर किन्तु छः मुखों वाले बालक में समाहित हो गए, और इसी कारण वे "कार्तिकेय" (कृत्तिकाओं के पुत्र) तथा "षडानन" (छः मुख वाले) कहलाए। अल्पायु में ही अद्भुत बल व तेज से सम्पन्न कार्तिकेय को देवताओं ने अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया, और उन्होंने शक्ति नामक अमोघ अस्त्र से तारकासुर सहित अनेक अन्य असुरों (जैसे सिंहमुख व क्रौंच पर्वत को विदीर्ण करने वाले) का संहार कर देवलोक में पुनः शांति स्थापित की। इसी पुराण में कार्तिकेय व गणेश के मध्य विवाह हेतु हुई स्पर्धा की प्रसिद्ध कथा भी आती है — दोनों भाइयों को पृथ्वी की परिक्रमा करने की चुनौती दी गई, यह निश्चय करते हुए कि जो पहले परिक्रमा पूर्ण करेगा, उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय अपने मयूर वाहन पर बैठकर वास्तविक, दीर्घ परिक्रमा हेतु निकल पड़े, जबकि बुद्धिमान गणेश ने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) की ही परिक्रमा कर यह तर्क प्रस्तुत किया कि माता-पिता में ही सम्पूर्ण सृष्टि व समस्त तीर्थ समाहित हैं। इस बुद्धि-चातुर्य से गणेश जी विजयी घोषित हुए और उनका विवाह पहले हुआ — यह कथा मातृ-पितृ भक्ति को सम्पूर्ण तीर्थाटन से भी श्रेष्ठ बताती है, तथा कार्तिकेय इसी स्पर्धा के पश्चात रुष्ट होकर दक्षिण भारत (क्रौंच पर्वत, तमिलनाडु) चले गए, जहां वे आज भी मुरुगन के नाम से अत्यंत श्रद्धा से पूजे जाते हैं, तथा तमिलनाडु के छः प्रमुख मुरुगन-मंदिर (अरुपदैवीडु) आज भी उनकी इस दक्षिण-यात्रा की स्मृति में प्रतिष्ठित हैं। पुराण में विभिन्न शिवलिंगों, विशेषकर काशी विश्वनाथ व केदारनाथ की उत्पत्ति-कथाओं, तथा गंगा, नर्मदा व अन्य पवित्र नदियों के माहात्म्य का भी गहन विवेचन मिलता है। वाराणसी में पंचक्रोशी यात्रा की विधि, तथा काशी के पंचतीर्थों (दशाश्वमेध, वरुणा-संगम, मणिकर्णिका, पंचगंगा व आदिकेशव) की यात्रा-विधि व महत्व का भी इसमें विस्तृत वर्णन है। नागर खण्ड में गुजरात व पश्चिम भारत के अनेक तीर्थों — द्वारका सहित — का भी वर्णन मिलता है, तथा वैष्णव खण्ड में बद्रीनाथ व अन्य विष्णु-तीर्थों का माहात्म्य प्राप्त होता है। इसके साथ ही अनेक व्रतों, दान-विधियों तथा धर्माचरण सम्बन्धी शिक्षाओं का भी विस्तृत संकलन इसमें प्राप्त होता है। स्कन्द पुराण की यह विशेषता है कि यह भारतवर्ष की सम्पूर्ण पवित्र भूगोल — हिमालय से लेकर समुद्र-तट तक, गंगा से लेकर नर्मदा तक — को एक ही दिव्य, जीवंत तीर्थ-क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, और यह सिखाता है कि सम्पूर्ण भारत-भूमि स्वयं ही एक महान तीर्थ है, जिसके प्रत्येक कण में परमात्मा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। (यह स्कन्द पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके विराट खण्डों, अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)