वराह पुराण भगवान विष्णु के वराह (शूकर) अवतार की महिमा को समर्पित प्रमुख पुराण है, और इसकी एक विशिष्ट पहचान यह है कि इसका कथन स्वयं भगवान वराह द्वारा भूदेवी (पृथ्वी देवी) को सम्बोधित करते हुए हुआ माना जाता है। परम्परा के अनुसार इसमें चौबीस सहस्र श्लोक हैं, और यह मुख्यतः वैष्णव भक्ति व मथुरा-माहात्म्य पर केन्द्रित है।
इस पुराण की केन्द्रीय कथा है — हिरण्याक्ष द्वारा पृथ्वी का हरण व उसका उद्धार। हिरण्यकशिपु के बड़े भ्राता हिरण्याक्ष नामक अत्यंत बलशाली असुर ने कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी से अजेयता का वर प्राप्त किया, और इस बल के मद में सम्पूर्ण पृथ्वी को उठाकर क्षीरसागर के गहनतम तल में ले जाकर छिपा दिया, जिससे सृष्टि का सम्पूर्ण संतुलन बिगड़ने लगा और समस्त प्राणियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया — न वर्षा होती थी, न फसलें उगतीं, और सम्पूर्ण जीव-जगत भय व संकट में डूब गया। देवताओं व ऋषियों की व्याकुल प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी की नासिका से एक अंगुष्ठ-मात्र आकार के वराह-शिशु रूप में प्रकट होकर, क्षण-भर में ही विशाल पर्वताकार रूप धारण किया — उनकी गर्जना से तीनों लोक कंपायमान हो उठे, तथा उनके शरीर से एक दिव्य, अलौकिक सुगंध प्रसारित होने लगी, जिसे अनुभव कर समस्त ऋषि-मुनि व देवता भी आश्चर्यचकित रह गए।
भगवान वराह समुद्र में गहराई तक प्रवेश कर हिरण्याक्ष को खोज निकाला। दोनों के मध्य हजार दिव्य वर्षों तक घोर युद्ध चला — हिरण्याक्ष ने अपनी माया-शक्ति से अनेक अस्त्र व छल के प्रहार किए, किन्तु भगवान वराह अविचल रहे। अंततः भगवान वराह ने अपने चक्र व गदा के प्रहार से हिरण्याक्ष का वध किया। इसके पश्चात् भगवान ने पृथ्वी को अपने दोनों दाढ़ों (दंतों) पर उठाकर अत्यंत कोमलता व सावधानी से पुनः क्षीरसागर के जल-तल से ऊपर उठाकर उसे यथास्थान पुनर्स्थापित किया — यही कारण है कि वराह-रूप को "पृथ्वी के रक्षक" के रूप में सर्वाधिक सम्मान दिया जाता है। भूदेवी ने अपने इस उद्धारकर्ता भगवान वराह के प्रति अपार कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, उनके चरणों में बैठकर, उनसे सृष्टि, धर्म, पाप-पुण्य के फल तथा विभिन्न लोकों के रहस्यों के विषय में अनेक प्रश्न पूछे, जिनके उत्तर में ही यह सम्पूर्ण पुराण रचा गया माना जाता है — भगवान ने इसी संवाद में पाप के विभिन्न प्रकारों, उनके प्रायश्चित की विधि, तथा विभिन्न दानों व व्रतों के फल का भी विस्तृत वर्णन किया।
इसी पुराण में मथुरा-माहात्म्य का भी अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है — मथुरा को भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण की सर्वाधिक प्रिय भूमि के रूप में वर्णित किया गया है, जहां के प्रत्येक वन (जैसे मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, काम्यवन, वृन्दावन, भद्रवन, खदिरवन, महावन, लोहवन, भांडीरवन व बेलवन — बारह प्रमुख वन) का अपना विशेष माहात्म्य व पुण्य-फल बताया गया है। वृन्दावन, गोवर्धन व यमुना-तट के विभिन्न स्थलों की पवित्रता व उनकी यात्रा-विधि का भी यहां विवेचन है, जो परवर्ती ब्रज-भक्ति परम्परा हेतु एक महत्वपूर्ण आधार-ग्रन्थ सिद्ध हुआ — वराह अवतार द्वारा स्वयं भूदेवी को यह बताया गया है कि मथुरा-मण्डल की भूमि अन्य समस्त भूमियों से श्रेष्ठ क्यों है, क्योंकि यहीं भगवान ने अपनी सर्वाधिक माधुर्यपूर्ण लीलाएं कीं, तथा यहां की रज-मात्र भी बैकुंठ-सुख से श्रेष्ठ फल देने वाली बताई गई है।
पुराण में प्रह्लाद-चरित्र का भी एक संक्षिप्त संस्करण मिलता है, जिसमें भक्त प्रह्लाद की अपने पिता हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के मध्य भी अविचल विष्णु-भक्ति, तथा अंततः नृसिंह-अवतार द्वारा उनकी रक्षा व हिरण्यकशिपु-वध का वर्णन है — यह इस पुराण में हिरण्याक्ष-वध की कथा के साथ ही एक पूरक प्रसंग के रूप में प्रस्तुत किया गया है, यह दर्शाते हुए कि दोनों भ्राताओं का अंत भगवान के ही विभिन्न अवतारों द्वारा हुआ। पुराण में विभिन्न नरसिंह-मंत्रों व उनकी साधना-विधि का भी संक्षिप्त उल्लेख मिलता है।
पुराण में धर्मशास्त्र सम्बन्धी विषयों — दान का महत्व, विभिन्न व्रतों की विधि, एकादशी-माहात्म्य, तथा सामाजिक आचार-संहिता — का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त सृष्टि-वर्णन, कल्प-मन्वन्तरों का विवेचन, तथा नरक व स्वर्ग के विभिन्न लोकों का भी वर्णन इसमें सम्मिलित है। पुराण में यम-नियम व योग-साधना के प्राथमिक सिद्धांतों का भी संक्षिप्त उल्लेख मिलता है, तथा गया-तीर्थ में पिण्डदान की महिमा का भी विशेष वर्णन है — यह बताया गया है कि गया में किया गया एक पिण्डदान इक्कीस पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति प्रदान करता है।
वराह पुराण की यह विशेषता है कि यह भूदेवी को, जिन्हें सामान्यतः निष्क्रिय, केवल धारण करने वाली शक्ति के रूप में देखा जाता है, स्वयं एक जिज्ञासु, संवाद करने वाली सचेत देवी के रूप में प्रस्तुत करता है — यह दर्शाता है कि पृथ्वी स्वयं भी एक जीवंत, चेतनायुक्त दिव्य सत्ता है, जिसकी रक्षा स्वयं परमात्मा अपने अवतार धारण कर करते हैं, और जिसकी पवित्रता व संतुलन की रक्षा मनुष्य का भी परम कर्तव्य है।
(यह वराह पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
