लिङ्ग पुराण भगवान शिव के निराकार-साकार स्वरूप — शिवलिङ्ग — की उपासना व उसके गूढ़ दार्शनिक रहस्य को समर्पित प्रमुख पुराण है। शिवलिङ्ग को शिव-शक्ति, पुरुष-प्रकृति अथवा निर्गुण-सगुण के अद्वैत मिलन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है — न केवल एक मूर्ति, अपितु सृष्टि के मूल स्तम्भ (अक्ष) का ही द्योतक, जो समस्त सृष्टि के आदि व अंत — दोनों को अपने भीतर समाहित किए हुए है। परम्परा के अनुसार इस पुराण में ग्यारह सहस्र श्लोक हैं, तथा इसका उपदेश स्वयं भगवान शिव द्वारा ऋषियों को नैमिषारण्य में दिया गया माना जाता है।
इस पुराण की सबसे प्रसिद्ध व गूढ़ कथा है — ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति, जो महाशिवरात्रि के महत्व का भी मूल आधार है। एक बार सृष्टि के आरम्भ में भगवान ब्रह्मा व भगवान विष्णु के मध्य यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि इन दोनों में श्रेष्ठ व सृष्टि का मूल कारण कौन है — दोनों ही अपने-अपने ऐश्वर्य व शक्ति का बखान करते हुए एक-दूसरे को न्यून सिद्ध करने का प्रयास करने लगे। इसी विवाद के मध्य आकाश को चीरता हुआ एक अनंत, अग्निमय तेजस्वी स्तम्भ प्रकट हुआ, जिसका न आदि दिखाई दिया न अंत, और जिसकी प्रचण्ड ज्योति से तीनों लोक कंपायमान हो उठे। दोनों देवों ने इस स्तम्भ के छोर को खोजने का निश्चय किया — भगवान विष्णु वराह रूप धारण कर पाताल की ओर अनंत काल तक खोदते गए, किन्तु तल न पा सके; भगवान ब्रह्मा हंस का रूप धारण कर आकाश की ओर अनंत काल तक उड़ते गए, किन्तु शीर्ष न पा सके। मार्ग में ब्रह्मा जी को केतकी पुष्प मिला, जो स्तम्भ के शीर्ष से नीचे गिर रहा था — ब्रह्मा जी ने उस पुष्प को साक्षी बनाकर मिथ्या दावा किया कि उन्होंने स्तम्भ का शीर्ष देख लिया है, और केतकी पुष्प ने भी भयवश इस झूठ का समर्थन कर दिया। यह जानकर शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी के इस असत्य कथन पर क्रुद्ध होकर उन्हें यह शाप दिया कि संसार में उनकी पूजा नहीं होगी, तथा केतकी पुष्प को भी झूठे साक्ष्य देने के कारण शिव-पूजा में सदा वर्जित घोषित कर दिया — यही कारण है कि आज भी शिवलिंग पर केतकी पुष्प अर्पित नहीं किया जाता।
अंततः दोनों देवों ने अपनी असफलता व अहंकार स्वीकार कर, इस असीम स्तम्भ के समक्ष नतमस्तक हो गए। तभी उस स्तम्भ में से स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए, और उन्होंने यह स्पष्ट किया कि न वे सृष्टि के किसी एक पक्ष से बंधे हैं, न उनका कोई आदि है न अंत — वे तो स्वयं अनंत, अगम्य सत्य हैं, और ब्रह्मा-विष्णु भी उन्हीं से उत्पन्न होकर, उन्हीं के आदेश से सृष्टि व पालन का कार्य करते हैं। यही वह पवित्र ज्योति-स्तम्भ है जिसकी स्मृति में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना व महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है — उसी रात्रि को, जब यह ज्योति-स्तम्भ प्रथम बार प्रकट हुआ था, तथा इसी कारण महाशिवरात्रि की रात्रि को जागरण व शिव-पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।
पुराण में यह भी वर्णित है कि लिंग-पूजा की यह परम्परा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह निराकार परब्रह्म की साकार उपासना का सर्वाधिक सरल व सार्वभौमिक माध्यम है — लिंग का अंडाकार, निराकार रूप न किसी विशिष्ट मानवीय आकृति से बंधा है, न किसी जाति-वर्ग से, अतः यह प्रत्येक साधक के लिए समान रूप से सुलभ व ग्रहणीय है। इसी कारण शिवलिंग-पूजा को सनातन धर्म की सर्वाधिक प्राचीन व सार्वभौमिक उपासना-पद्धतियों में गिना जाता है — यहां तक कि एक मुट्ठी मिट्टी से बनाया गया साधारण लिंग भी उतनी ही श्रद्धा से पूजनीय माना जाता है जितना किसी भव्य मंदिर का रत्न-जड़ित लिंग।
इसके साथ ही पुराण में सृष्टि-विज्ञान, कल्प-मन्वन्तरों का वर्णन, तथा विभिन्न मन्वन्तरों में शिव जी के अट्ठाईस अवतारों (जिनमें नकुलीश प्रसिद्ध हैं) का भी विवेचन मिलता है, जिनमें से प्रत्येक अवतार किसी विशिष्ट योग-परम्परा अथवा दार्शनिक सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है — इन अवतारों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि शिव जी, विष्णु जी के ही समान, प्रत्येक युग व काल में धर्म-संस्थापना हेतु विभिन्न रूपों में अवतरित होते रहे हैं। पुराण में शिव-सहस्रनाम व उनके विभिन्न नामों की महिमा का भी वर्णन है, साथ ही पंचाक्षर मंत्र ("ॐ नमः शिवाय") की साधना-विधि व महत्व पर भी बल दिया गया है।
लिङ्ग पुराण में दक्ष-यज्ञ-विध्वंस की कथा का भी एक संस्करण मिलता है, तथा पार्वती जी की तपस्या व शिव-विवाह का संक्षिप्त वर्णन भी इसमें सम्मिलित है, जो अन्य शैव पुराणों की कथाओं से सामंजस्य रखता है। इसके अतिरिक्त अंधकासुर की कथा का भी विस्तृत वर्णन इसमें मिलता है — अंधक, जो हिरण्याक्ष का पुत्र था किन्तु जन्म से अंधा था, ने शिव जी की कठोर तपस्या से असाधारण शक्ति प्राप्त की, किन्तु अहंकारवश माता पार्वती को ही अपनी पत्नी बनाने की दुष्ट इच्छा रखने लगा। क्रुद्ध शिव जी ने त्रिशूल से उसका वध किया, किन्तु उसके रक्त की हर बूंद से नए अंधक उत्पन्न होने लगे — इस संकट को दूर करने हेतु योगेश्वरी शक्तियों (मातृकाओं) ने रक्त को धरती पर गिरने से पूर्व ही पी लिया, जिससे अंततः अंधक का पूर्ण विनाश सम्भव हुआ, और अंततः वह पश्चाताप कर शिव जी का गण (भृंगी के समान) बन गया। पुराण में जलंधर नामक असुर-राजा की कथा का भी एक संस्करण मिलता है, जो समुद्र-पुत्र होने के कारण असाधारण बल रखता था किन्तु अंततः अपने ही पाप-कर्मों के कारण शिव जी द्वारा संहार को प्राप्त हुआ।
पुराण में शिव-गीता नामक एक संक्षिप्त दार्शनिक खण्ड भी मिलता है, जिसमें आत्म-ज्ञान, योग-साधना व मोक्ष-प्राप्ति के उपायों का उपदेश दिया गया है, तथा यह भी बताया गया है कि किस प्रकार ध्यान व भक्ति — दोनों के समन्वय से ही साधक परम शिव-तत्त्व को प्राप्त कर सकता है। काशी, केदारनाथ व अन्य प्रमुख शैव तीर्थों के माहात्म्य का भी इसमें संक्षिप्त उल्लेख मिलता है।
लिङ्ग पुराण की यह विशेषता है कि यह मूर्त उपासना व निर्गुण दर्शन — दोनों के मध्य के अंतर को समाप्त कर देता है। ज्योति-स्तम्भ की कथा के माध्यम से यह सिखाता है कि परमात्मा किसी भी सीमा, माप अथवा दिशा में बंधे नहीं हैं, और सच्ची भक्ति वही है जो अपने अहंकार (चाहे वह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा अथवा पालनकर्ता विष्णु का ही क्यों न हो) को त्यागकर इस असीम सत्य के समक्ष समर्पण करे।
(यह लिङ्ग पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
