ब्रह्मवैवर्त पुराण चार प्रमुख खण्डों में विभक्त है — ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड, गणेश खण्ड तथा श्रीकृष्ण जन्म खण्ड — और यह पुराण विशेषतः प्रकृति (दिव्य स्त्री-तत्त्व) की सर्वोच्च महिमा तथा श्रीराधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति-महिमा के लिए प्रसिद्ध है। परम्परा के अनुसार इसमें अठारह सहस्र श्लोक हैं, तथा इसका उपदेश स्वयं सूत मुनि द्वारा नैमिषारण्य के ऋषियों को दिया गया माना जाता है।
ब्रह्म खण्ड में सृष्टि-वर्णन, गोलोक की महिमा (भगवान श्रीकृष्ण का परम नित्य-धाम, जो वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ माना जाता है) तथा श्रीकृष्ण के विराट-स्वरूप का वर्णन मिलता है। इसमें यह बताया गया है कि गोलोक में श्रीकृष्ण सदा राधा जी के साथ, गोपियों व गौओं से घिरे, नित्य-लीला में रत रहते हैं, और यही लोक समस्त सृष्टि का परम उद्गम-स्थान है। इस खण्ड में नारद मुनि के ब्रह्मा जी से किए गए प्रश्नों के माध्यम से सृष्टि-रचना, कल्प-मन्वन्तरों तथा विभिन्न लोकों की संरचना का भी विस्तृत विवेचन मिलता है, तथा यह भी वर्णित है कि किस प्रकार विभिन्न देवता अपने-अपने लोकों में भगवान के ही अंश-स्वरूप प्रतिष्ठित हैं। गणेश जी की उत्पत्ति का एक प्रारम्भिक संकेत भी इसी खण्ड में दिया गया है, जिसका विस्तृत विवरण आगे गणेश खण्ड में मिलता है।
प्रकृति खण्ड इस पुराण का सर्वाधिक दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण भाग है। इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि समस्त देवियां — दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, राधा, सीता, तुलसी — वस्तुतः एक ही आदि-प्रकृति के विभिन्न रूप व अभिव्यक्तियां हैं, जो सृष्टि के आरम्भ में पांच मुख्य रूपों में विभाजित हुईं। जिस प्रकार परब्रह्म परमात्मा अनेक अवतारों में प्रकट होते हैं, उसी प्रकार आदि-प्रकृति भी काल व आवश्यकता के अनुसार विभिन्न रूपों में प्रकट होकर सृष्टि का पालन-पोषण व संतुलन करती हैं। यह खण्ड स्त्री-तत्त्व को पुरुष-तत्त्व के समान ही — वस्तुतः उससे भी पूर्व व मौलिक — सृष्टि के केन्द्र में प्रतिष्ठित करता है, और यह सिखाता है कि शक्ति के बिना शिव भी "शव" मात्र हैं, अर्थात् चेतना को क्रियाशील बनाने वाली शक्ति ही प्रकृति है। इस खण्ड में राधा जी की उत्पत्ति की भी एक विशिष्ट कथा वर्णित है — यह बताया गया है कि गोलोक में ही राधा जी स्वयं श्रीकृष्ण के वाम-अंग से उत्पन्न हुईं, तथा उनका व कृष्ण का सम्बन्ध किसी लौकिक पति-पत्नी के सम्बन्ध से सर्वथा भिन्न, एक नित्य, आध्यात्मिक अभिन्नता का सम्बन्ध है। इसी खण्ड में लक्ष्मी, सरस्वती व गंगा — तीनों देवियों के मध्य हुए एक पारिवारिक विवाद की कथा भी आती है, जिसके फलस्वरूप इन तीनों का विभाजन अलग-अलग लोकों व पतियों के साथ हुआ — यह कथा यह दर्शाती है कि देवी-शक्तियां भी मानवीय भाव-संवेदनाओं से अछूती नहीं हैं।
इसी पुराण में श्रीराधा को श्रीकृष्ण की सनातन, अभिन्न सहचरी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है — यहां तक कि कुछ प्रसंगों में राधा को कृष्ण से भी पृथक, स्वतंत्र आराध्य-शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जो गोलोक में सदा कृष्ण के साथ नित्य-विद्यमान रहती हैं, तथा जिनके विरह में स्वयं श्रीकृष्ण भी व्याकुल हो उठते हैं। एक प्रसिद्ध प्रसंग में, एक बार सुदामा नामक गोप के शाप के कारण ही राधा व कृष्ण को पृथ्वी पर पृथक-पृथक जन्म लेकर विरह सहना पड़ा — यही विरह वृन्दावन की रासलीला व गोपी-भाव की समस्त भक्ति-साहित्यिक परम्परा का मूल स्रोत माना जाता है। यह सिद्धांत परवर्ती गौड़ीय वैष्णव परम्परा — विशेषकर चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-धारा — व राधा-कृष्ण भक्ति-साहित्य के विकास पर गहरा प्रभाव डालने वाला सिद्ध हुआ।
गणेश खण्ड में भगवान गणेश के जन्म, उनकी बाल-लीलाओं, उनके दो विवाह (रिद्धि व सिद्धि से, जिनसे उन्हें क्षेम व लाभ नामक पुत्र प्राप्त हुए), तथा उनके द्वारा विभिन्न असुरों — विशेषकर सिन्दूरासुर, जिसने गणेश जी के ही अवतार-स्वरूप से भयभीत होकर अंततः उन्हीं की शरण ली, तथा जिसके वध के पश्चात गणेश जी ने उसके रक्त व शरीर के भस्म को अपने ही शरीर पर सिंदूर के रूप में धारण किया, जिस कारण गणेश जी को सिंदूर चढ़ाने की परम्परा आरम्भ हुई — के संहार की कथाएं वर्णित हैं। गणेश जी के विभिन्न अवतारों (वक्रतुण्ड, एकदंत, महोदर आदि) का भी इस खण्ड में उल्लेख मिलता है, प्रत्येक अवतार किसी विशिष्ट असुर के संहार से जुड़ा हुआ, तथा उनके चूहे-वाहन की उत्पत्ति की भी एक संक्षिप्त कथा इसमें मिलती है।
श्रीकृष्ण जन्म खण्ड में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म व बाल-लीलाओं का एक विशिष्ट, भक्ति-प्रधान व भावनात्मक दृष्टिकोण से वर्णन मिलता है, जिसमें वृन्दावन की रासलीला व गोपी-भाव की महिमा पर विशेष बल दिया गया है — यहां गोपियों के प्रेम को किसी लौकिक आसक्ति के रूप में नहीं, अपितु जीवात्मा की परमात्मा के प्रति सर्वोच्च, निष्काम प्रेम-भक्ति के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। कंस-वध, पूतना-वध, तथा कालिय-नाग-दमन जैसी बाल-लीलाओं का भी इस खण्ड में विस्तृत वर्णन मिलता है, साथ ही राधा-कृष्ण के मिलन व वियोग के विभिन्न भावपूर्ण प्रसंगों का भी सुंदर चित्रण इसमें प्राप्त होता है।
इस पुराण में तुलसी-माहात्म्य का भी विस्तृत वर्णन है — तुलसी को स्वयं एक देवी के रूप में, वृन्दा नामक एक परम सती स्त्री के शाप व रूपांतरण की कथा के माध्यम से वर्णित किया गया है। वृन्दा का विवाह जालंधर नामक असुर से हुआ था, जिसकी अजेयता उसकी पत्नी की अटूट पतिव्रता-निष्ठा के कारण ही थी। जालंधर के अत्याचार से त्रस्त देवताओं की सहायता हेतु भगवान विष्णु ने जालंधर का ही रूप धारण कर वृन्दा के सतीत्व को भंग किया, जिससे जालंधर का वध सम्भव हुआ। सत्य जानने पर अत्यंत क्रोधित व दुःखी वृन्दा ने भगवान विष्णु को पाषाण (शालिग्राम शिला) बनने का शाप दिया, और स्वयं अग्नि में प्रवेश कर गईं — उनकी भस्म से ही तुलसी के पौधे का जन्म हुआ। भगवान विष्णु ने इस शाप को सहर्ष स्वीकार किया, और यही कारण है कि आज भी शालिग्राम-तुलसी विवाह की परम्परा हिन्दू घरों में अत्यंत पवित्र मानी जाती है, तथा भगवान को तुलसी-पत्र अर्पित किए बिना कोई भी भोग अपूर्ण माना जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण की यह विशेषता है कि यह सनातन धर्म की भक्ति-परम्परा में स्त्री-तत्त्व — चाहे वह प्रकृति के रूप में हो, राधा के रूप में हो, अथवा तुलसी/वृन्दा के रूप में — को केन्द्रीय, अपरिहार्य स्थान प्रदान करता है, और यह गहन संदेश देता है कि सृष्टि का संचालन पुरुष व प्रकृति, शिव व शक्ति के संयुक्त, अविभाज्य सहयोग से ही सम्भव है।
(यह ब्रह्मवैवर्त पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त खण्डों, अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
