भविष्य पुराण अपने नाम के अनुरूप ही भविष्य से सम्बन्धित विषयों, विशेषकर आने वाले युगों में धर्माचरण की दिशा, पर केन्द्रित माना जाता है। यह पुराण चार पर्वों में विभक्त है — ब्रह्म पर्व, मध्यम पर्व, प्रतिसर्ग पर्व तथा उत्तर पर्व — जिनमें सृष्टि-वर्णन से लेकर व्रत-विधान तथा भविष्य-सम्बन्धी उपदेशों तक विविध विषय समाहित हैं।
इस पुराण की एक अत्यंत विशिष्ट पहचान यह है कि यह अठारह पुराणों में सूर्य-उपासना को सर्वाधिक प्रमुखता देने वाला ग्रन्थ है। जहां अधिकांश पुराण विष्णु, शिव अथवा देवी-उपासना पर केन्द्रित हैं, वहीं भविष्य पुराण में भगवान सूर्य की महिमा, उनके विभिन्न नामों व रूपों (द्वादश आदित्य), सूर्य-मंदिरों के निर्माण-विधान, तथा सूर्य-षष्ठी (छठ पूजा का मूल आधार), रथ-सप्तमी जैसे सूर्य-सम्बन्धी व्रतों का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। पुराण में यह भी वर्णित है कि प्राचीन काल में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों (मग ब्राह्मण) द्वारा सूर्य-उपासना की एक समृद्ध, स्वतंत्र परम्परा (सौर सम्प्रदाय) स्थापित की गई थी — कथा के अनुसार, स्वयं श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग से मुक्ति हेतु शाकद्वीप से सूर्य-पूजक ब्राह्मणों को भारत आमंत्रित करना पड़ा था, जो मूलतः ईरानी भूभाग के सूर्य-उपासक थे, और जिनके वंशज ही आगे चलकर सौर-उपासना परम्परा के प्रमुख आचार्य बने। इन्हीं की पूजा-विधि व मूल सिद्धांत भविष्य पुराण में संरक्षित हैं। कोणार्क जैसे भव्य सूर्य-मंदिरों की स्थापत्य-परम्परा भी इसी सौर-भक्ति परम्परा से प्रेरित रही है, जहां मंदिर को ही सूर्यदेव के विशाल रथ के रूप में, सात अश्वों व चौबीस पहियों सहित, निर्मित किया गया — प्रत्येक पहिया एक मास के किसी पक्ष का तथा सात अश्व सप्तरंगी प्रकाश का प्रतीक माने जाते हैं।
पुराण में अनेक व्रतों — सावित्री व्रत (जिसमें सावित्री-सत्यवान की कथा वर्णित है, जहां सावित्री ने अपने पिता अश्वपति की इच्छा के विरुद्ध अल्पायु सत्यवान को ही पति चुना, और जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तब सावित्री ने उनका पीछा करते हुए अपनी बुद्धि, पतिव्रता-निष्ठा व शास्त्रार्थ से यमराज को ही प्रसन्न कर लिया — यमराज ने पहले उसे अन्य वर दिए, किन्तु अंततः सावित्री की चतुराई से बाध्य होकर उसे यह वरदान भी देना पड़ा कि सत्यवान पुनः जीवित हो जाए, जिससे उसके पहले दिए गए वर — सौ पुत्रों का सुख — भी स्वाभाविक रूप से पूर्ण हो सके), अनंत चतुर्दशी व्रत (जिसमें राजा कौण्डिन्य व उनकी पत्नी की कथा है, जो अनंत-सूत्र का अपमान करने से विपत्ति में पड़े और पुनः विधिवत व्रत कर समृद्धि प्राप्त करते हैं), तथा विभिन्न संक्रांतियों से सम्बन्धित विधानों — का भी विस्तृत वर्णन है। होली (वसंतोत्सव/होलिका दहन) व्रत का भी इसमें वर्णन मिलता है, जिसमें भक्त प्रह्लाद की होलिका द्वारा जलाए जाने के प्रयास से रक्षा की कथा को ही इसका मूल आधार बताया गया है।
कथा-संरचना की दृष्टि से इस पुराण को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को भविष्य में धर्म के संभावित स्वरूपों व चुनौतियों के विषय में दिए गए उपदेश के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है — यह शैली इसे अन्य पुराणों से पृथक पहचान देती है, जिसमें अतीत की कथाओं के स्थान पर भविष्य के प्रति सजगता व सावधानी पर बल दिया गया है। प्रतिसर्ग पर्व में सृष्टि के पुनर्निर्माण, विभिन्न मन्वन्तरों के आगामी स्वरूप, तथा धर्म के क्रमिक ह्रास व पुनरुत्थान के चक्र का भी वर्णन मिलता है, तथा चारों युगों (सत, त्रेता, द्वापर व कलि) के पृथक-पृथक लक्षणों व औसत आयु-धर्म का भी इसमें विस्तृत विवेचन है।
इस पुराण में वर्ण-व्यवस्था, सामाजिक आचार-संहिता, दान के विभिन्न प्रकार (गौ-दान, भूमि-दान, अन्न-दान, विद्या-दान), तथा विभिन्न यज्ञों व पूजा-विधियों का भी विवेचन मिलता है। तीर्थ-यात्रा सम्बन्धी नियम व विभिन्न तीर्थों का महात्म्य भी इसमें वर्णित है, तथा राजाओं के कर्तव्य व प्रजा-पालन सम्बन्धी शिक्षाएं भी इसमें सम्मिलित हैं। उत्तर पर्व में विशेषतः राजधर्म व न्याय-व्यवस्था पर भी पर्याप्त सामग्री मिलती है, जो एक आदर्श राज्य-प्रशासन की रूपरेखा प्रस्तुत करती है।
विद्वानों के मध्य यह सर्वज्ञात तथ्य है कि कालांतर में इस पुराण में समय-समय पर अनेक प्रक्षेप (बाद में जोड़ी गई सामग्री) भी हुए हैं, जिस कारण इसकी मूल, प्राचीन सामग्री को परवर्ती जोड़ से पृथक समझने हेतु विद्वत्तापूर्ण सतर्कता आवश्यक मानी जाती है — यह उस परम्परा की ही एक झलक है जिसमें प्रत्येक पुराण समय के साथ जीवंत, विकासशील ग्रन्थों के रूप में रहे, न कि एक ही बार में सम्पूर्णतः रचे गए स्थिर ग्रन्थों के रूप में।
भविष्य पुराण की यह विशेषता है कि यह सौर-उपासना की समृद्ध, किन्तु आज अपेक्षाकृत कम प्रचलित परम्परा को संरक्षित रखता है, और यह स्मरण कराता है कि सनातन धर्म की भक्ति-परम्पराएं कितनी विविधतापूर्ण रही हैं — सूर्य, जो समस्त जीवन के प्रत्यक्ष दृश्यमान स्रोत हैं, उनकी उपासना भी उतनी ही प्राचीन व गहन रही है जितनी विष्णु, शिव अथवा देवी की। साथ ही सावित्री जैसी कथाओं के माध्यम से यह पुराण नारी की बुद्धि, निष्ठा व साहस को भी सर्वोच्च सम्मान प्रदान करता है, यह दर्शाते हुए कि स्वयं यमराज को भी दृढ़ निष्ठा व तर्क-शक्ति से परास्त किया जा सकता है।
(यह भविष्य पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त पर्वों, अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
