अग्नि पुराण की रचना स्वयं अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को उपदेश के रूप में हुई मानी जाती है, और यह अठारह महापुराणों में सर्वाधिक विश्वकोशीय (एनसाइक्लोपीडिक) ग्रन्थ के रूप में प्रसिद्ध है। जहां अधिकांश पुराण मुख्यतः धार्मिक कथाओं, भक्ति व तीर्थ-माहात्म्य पर केन्द्रित हैं, वहीं अग्नि पुराण अत्यंत व्यापक, लौकिक व व्यावहारिक विषयों को भी समान गम्भीरता से समाहित करता है, जिस कारण प्राचीन भारत में इसे एक प्रकार का "सर्वविद्या-संग्रह" भी माना जाता था — यह पुराण महर्षि वशिष्ठ से होते हुए महर्षि वेदव्यास तक, और उनसे सूत मुनि तक पहुंचा, जिन्होंने इसे नैमिषारण्य में एकत्रित ऋषियों की सभा में सुनाया।
पुराण के आरम्भिक भाग में भगवान विष्णु के दशावतारों — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि — की संक्षिप्त कथाओं का वर्णन है। मत्स्यावतार में मनु व जलप्लावन की कथा, वराह अवतार में हिरण्याक्ष-वध व पृथ्वी-उद्धार, नृसिंह अवतार में प्रह्लाद-रक्षा व हिरण्यकशिपु-वध, वामन अवतार में राजा बलि से त्रिलोक-दान, तथा परशुराम द्वारा इक्कीस बार पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त करने की कथाएं यहां संक्षेप में प्रस्तुत की गई हैं। श्रीराम व श्रीकृष्ण की कथाओं का भी संक्षिप्त सार यहां दिया गया है — रामायण के सातों काण्डों तथा कृष्ण-जन्म से लेकर द्वारका-लीला तक का संक्षिप्त विवरण भी इसमें मिलता है, तथा कल्कि अवतार के भविष्य में, कलियुग के अंत में, अधर्म के नाश व सतयुग के पुनः आरम्भ हेतु प्रकट होने की भविष्यवाणी का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्हें शम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर जन्म लेने वाला बताया गया है।
इसके साथ ही शिव व देवी की उपासना-विधि, मंदिर-निर्माण व प्रतिमा-प्रतिष्ठा की विधियां भी विस्तार से दी गई हैं — विशेषतः प्राण-प्रतिष्ठा के समय किए जाने वाले नेत्रोन्मीलन (आंखें खोलने) की विधि, कलश-स्थापना, तथा विभिन्न देवताओं की प्रतिमाओं के निर्माण में पाले जाने वाले अनुपातों (तालमान) का वर्णन इसमें विस्तार से मिलता है। यज्ञ-विधि, होम की प्रक्रिया, तथा विभिन्न यज्ञों में प्रयुक्त होने वाले मंत्रों व सामग्री का भी विस्तृत विवेचन इसमें प्राप्त होता है, साथ ही तंत्र-साधना व विभिन्न यंत्रों की रचना-विधि का भी संक्षिप्त उल्लेख मिलता है।
किन्तु इस पुराण की सर्वाधिक विशिष्ट पहचान इसके असाधारण रूप से विस्तृत विषय-क्षेत्र में है। राजनीति व शासन-व्यवस्था (राजनीति-शास्त्र) पर इसमें गहन विवेचन मिलता है — एक आदर्श राजा के कर्तव्य, मंत्रिपरिषद की भूमिका, सप्तांग राज्य (राजा, मंत्री, सुहृद, कोष, राष्ट्र, दुर्ग व सेना) की अवधारणा, दण्ड-व्यवस्था, तथा साम-दाम-दण्ड-भेद — चार उपायों द्वारा शत्रु व मित्र राज्यों के साथ कूटनीति के सिद्धांत यहां वर्णित हैं। युद्ध-नीति, सैन्य-व्यूह-रचना (चक्र-व्यूह, गरुड़-व्यूह, मकर-व्यूह आदि) व विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग, दुर्ग-निर्माण की विधि, तथा शत्रु-राज्य पर आक्रमण के उपयुक्त समय व परिस्थितियों पर भी पर्याप्त सामग्री है, तथा छः गुणों (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव व संश्रय) के प्रयोग की नीति भी इसमें वर्णित है।
आयुर्वेद के अंतर्गत विभिन्न रोगों के लक्षण, निदान व चिकित्सा-विधि, औषधियों के गुण-धर्म, नाड़ी-परीक्षा तथा शल्य-चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान भी इसमें संकलित है — ज्वर, कुष्ठ, क्षय व अन्य प्रमुख रोगों के उपचार, तथा विभिन्न वनस्पतियों व धातुओं के औषधीय गुणों का विस्तृत विवरण इसमें मिलता है। पशु-चिकित्सा (विशेषकर अश्व व हाथियों की चिकित्सा) पर भी इसमें एक संक्षिप्त अनुभाग मिलता है। व्याकरण-शास्त्र पर भी इसमें एक सम्पूर्ण खण्ड है, जो संस्कृत भाषा के शब्द-रूपों, धातु-पाठ व व्याकरणिक नियमों का विवेचन करता है, तथा छन्दशास्त्र के मूल सिद्धांत (गायत्री, अनुष्टुप आदि छन्दों की रचना-विधि) भी यहां वर्णित हैं।
अलंकार-शास्त्र (काव्यशास्त्र) के अंतर्गत कविता की विभिन्न शैलियों, अलंकारों (उपमा, रूपक, यमक आदि), रस-सिद्धांत (नौ रसों का वर्गीकरण — श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत व शांत) तथा नाटक-रचना के सिद्धांतों का भी वर्णन मिलता है, जो इसे साहित्यिक अध्ययन हेतु भी एक महत्वपूर्ण स्रोत बनाता है। ज्योतिष-शास्त्र पर भी इसमें सामग्री है — ग्रह-गणना, मुहूर्त-निर्णय तथा फलित-ज्योतिष के मूल सिद्धांत यहां वर्णित हैं। वास्तु-शास्त्र व मंदिर-स्थापत्य कला पर भी विस्तृत विवेचन है — नागर, द्रविड़ व वेसर शैलियों सहित मंदिरों के विभिन्न प्रकार, उनकी रचना-विधि, तथा प्रतिमा-निर्माण के अनुपात व नियम इसमें दिए गए हैं। रत्न-परीक्षा (गेमोलॉजी) — विभिन्न रत्नों (माणिक्य, मोती, पुखराज आदि) की पहचान, उनके गुण-दोष व धारण-विधि — पर भी इसमें एक पृथक अनुभाग है।
अग्नि पुराण के अंतिम भाग में योग के अष्टांग मार्ग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) का विस्तृत विवेचन, वेदांत-दर्शन के मूल सिद्धांत (आत्मा-ब्रह्म का अभेद), तथा मृत्यु के पश्चात आत्मा की गति व पुनर्जन्म सम्बन्धी विवेचन भी मिलता है। गृह-निर्माण (वास्तु), वन-रोपण व कृषि सम्बन्धी कुछ व्यावहारिक सूत्र भी इसमें संकलित हैं, तथा गीता के अठारह अध्यायों का भी एक संक्षिप्त सार इस पुराण में प्राप्त होता है, जो इसकी विषय-व्यापकता को और भी उजागर करते हैं।
अग्नि पुराण की यह विशेषता है कि यह धर्म को जीवन के किसी एक पृथक, सीमित क्षेत्र तक सीमित नहीं मानता, अपितु राजनीति, चिकित्सा, भाषा, साहित्य, स्थापत्य कला, ज्योतिष — मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को ही धर्म की परिधि में समाहित मानता है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय विद्वान इसे केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं, अपितु एक सम्पूर्ण शिक्षा-संहिता के रूप में भी अध्ययन करते थे, और राजाओं, वैद्यों, शिल्पियों व कवियों — सभी के लिए यह एक अपरिहार्य संदर्भ-ग्रन्थ माना जाता था।
(यह अग्नि पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)
