पुराण ७

मार्कण्डेय पुराण

मार्कण्डेय पुराण की रचना-शैली अन्य पुराणों से कुछ भिन्न व विशिष्ट है। इसका आरम्भ महर्षि जैमिनि — जो महर्षि व्यास के शिष्य हैं — द्वारा महर्षि मार्कण्डेय से महाभारत के कुछ जटिल प्रसंगों पर प्रश्न पूछने से होता है। मार्कण्डेय मुनि स्वयं तपस्या में व्यस्त होने के कारण जैमिनि को अपने चार शिष्यों — पिंगाक्ष, सुमुख, विबोध व सुपुत्र — के पास भेजते हैं, जो स्वयं भी मनुष्य नहीं, अपितु दिव्य पक्षी थे। इन पक्षियों के ज्ञान की भी अपनी एक गहन कथा है — इनकी माता सुमति वास्तव में एक शापित गन्धर्व-पत्नी थीं, जिन्हें अपने ही दुर्व्यवहार के कारण पक्षी-योनि में जन्म लेना पड़ा था; गर्भावस्था में ही उन्होंने महर्षि व्यास के मुख से सम्पूर्ण महाभारत श्रवण किया था, और यही अलौकिक ज्ञान उनके अंडों में उदरस्थ शिशु-पक्षियों तक भी संचारित हो गया। इसी कारण ये चारों पक्षी, यद्यपि पक्षी-रूप में थे, फिर भी वेद-वेदांग व इतिहास-पुराण के पूर्ण ज्ञाता थे, और इन्हीं के माध्यम से जैमिनि के प्रश्नों का उत्तर दिया गया। जैमिनि के चार प्रमुख प्रश्न थे — भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण, स्वयं परमेश्वर होते हुए भी, मनुष्य रूप में जन्म लेकर मानवोचित कष्ट व संकट क्यों सहते हैं; द्रौपदी के पांच पतियों के पीछे क्या रहस्य है; बलराम जी ने शेषनाग का अवतार होते हुए भी मदिरापान क्यों किया; तथा द्रौपदी के पांचों पुत्रों की असमय मृत्यु क्यों हुई। इन प्रश्नों के उत्तर के क्रम में अनेक धर्म-कथाएं व नैतिक आख्यान प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें राजा हरिश्चन्द्र की कथा सर्वाधिक प्रसिद्ध है — सत्य की रक्षा हेतु अपना राज्य, धन, पत्नी-पुत्र तथा अंततः स्वयं को भी एक चाण्डाल के हाथों बेच देने वाले इस सत्यप्रतिज्ञ राजा की कथा, जिसमें श्मशान में कर वसूलते समय अपनी ही पत्नी व सर्प-दंश से मृत पुत्र को पहचानने पर भी कर्तव्य-पालन में अडिग रहने के कारण अंततः स्वयं धर्मराज व विश्वामित्र ने प्रसन्न होकर उन्हें सब कुछ पुनः लौटा दिया, तथा सदेह स्वर्ग जाने का सौभाग्य भी प्रदान किया — यह कथा सिखाती है कि सत्य व धर्म का पालन कितनी भी बड़ी परीक्षा में भी नहीं छोड़ना चाहिए। इस पुराण में स्वयं महर्षि मार्कण्डेय की अपनी चिरंजीवी होने की अद्भुत कथा भी अंतर्निहित है, जिनके नाम पर यह सम्पूर्ण पुराण प्रसिद्ध हुआ। बाल्यकाल में ही अल्पायु होने के शाप से ग्रस्त मार्कण्डेय ने शिव जी की ऐसी अविचल भक्ति की कि जब स्वयं यमराज उनके प्राण हरने आए, तब बालक मार्कण्डेय शिवलिंग से इतनी दृढ़ता से लिपट गए कि यमराज को लिंग सहित बालक पर ही पाश फेंकना पड़ा — इसी क्षण शिव जी स्वयं लिंग से प्रकट होकर यमराज को ही पैर से प्रहार कर दूर कर दिया, और प्रसन्न होकर मार्कण्डेय को चिरंजीवी (सदा युवा व अमर, सोलह वर्ष की आयु में ही सदा स्थिर) होने का वरदान दिया। इसी वरदान के कारण मार्कण्डेय मुनि ने अनेक प्रलयों को अपनी आंखों से देखा — एक बार महाप्रलय के जल में सम्पूर्ण सृष्टि विलीन हो चुकी थी, और मार्कण्डेय अकेले उस अनंत जल-राशि में सहस्रों वर्षों तक तैरते हुए भटक रहे थे, तभी उन्हें एक वटवृक्ष के पत्ते पर लेटे हुए एक दिव्य शिशु के दर्शन हुए, जो अपने ही पैर के अंगूठे को चूस रहा था — यह शिशु स्वयं भगवान विष्णु का ही बाल-रूप था। उस शिशु ने श्वास लेते हुए मार्कण्डेय को अपने भीतर खींच लिया, जहां उन्हें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, समस्त लोक, पर्वत, नदियां व जीव-जगत के दर्शन हुए — मानो सम्पूर्ण सृष्टि ही उस शिशु के भीतर समाहित हो — और फिर शिशु की श्वास-मात्र से वे पुनः बाहर निकाल दिए गए। यह दर्शन मार्कण्डेय को यह गहन अनुभूति कराता है कि सृष्टि व प्रलय, दोनों ही उसी एक अनंत परमात्मा की लीला-मात्र हैं, और वे इस अनुभव के पश्चात शत वर्षों तक उसी भगवद्-दर्शन के आनंद में लीन रहे। किन्तु मार्कण्डेय पुराण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा जगत-प्रसिद्ध विषय-वस्तु है — देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती अथवा चण्डी पाठ के नाम से भी जाना जाता है। सात सौ श्लोकों व तेरह अध्यायों में विभक्त यह अंश सनातन धर्म में देवी-उपासना का मूल आधार-ग्रन्थ माना जाता है, और आज भी नवरात्रि के नौ दिनों में इसका पाठ अत्यंत श्रद्धा से किया जाता है। देवी माहात्म्य की कथा राजा सुरथ व वैश्य समाधि के माध्यम से प्रस्तुत की गई है — राजा सुरथ को अपने ही मंत्रियों के छल से राज्य-भ्रष्ट होना पड़ा था, तथा समाधि नामक वैश्य को अपने ही परिवार ने धन के लोभ में घर से निकाल दिया था; दोनों ही अपना सर्वस्व खोकर वन में एक ऋषि के आश्रम में पहुंचते हैं, जहां दोनों को ही आश्चर्य होता है कि अपने से दुर्व्यवहार करने वालों के प्रति भी उनके मन में स्नेह व चिंता बनी हुई है — ऋषि उन्हें समझाते हैं कि यह महामाया का ही प्रभाव है, जो समस्त प्राणियों को मोहित रखती है, और इसी प्रसंग में वे आदिशक्ति की महिमा का यह सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाते हैं। इस वृत्तांत में तीन प्रमुख प्रसंग आते हैं। प्रथम — मधु-कैटभ वध — जिसमें प्रलय-काल में भगवान विष्णु की योगनिद्रा स्वरूपा देवी, ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर विष्णु को जगाकर उन्हें दो उन्मत्त असुरों मधु व कैटभ के वध में सहायक बनती हैं, जिन्होंने भगवान को छल से यह वरदान देने पर बाध्य कर दिया था कि उनका वध केवल ऐसे स्थान पर हो जहां पृथ्वी न हो — भगवान ने अपनी ही जंघाओं पर उन्हें रखकर इस शर्त को पूर्ण करते हुए उनका वध किया। द्वितीय व सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंग है — महिषासुर मर्दिनी — जिसमें समस्त देवताओं के तेज से एकत्रित होकर, प्रत्येक देवता द्वारा अपना-अपना दिव्य अस्त्र (शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, इन्द्र का वज्र, हिमावन का सिंह-वाहन आदि) अर्पित किए जाने पर, देवी दुर्गा का प्राकट्य होता है, जो महिषासुर नामक भैंसे-रूपधारी असुर, जिसने यह वरदान प्राप्त किया था कि कोई पुरुष उसे न मार सके, का नौ दिनों के घोर युद्ध के पश्चात संहार करती हैं — यही प्रसंग नवरात्रि-पूजन का मूल आधार है। तृतीय प्रसंग — शुम्भ-निशुम्भ वध — में देवी कौशिकी (अम्बिका) रूप धारण कर, काली व सप्तमातृकाओं की सहायता से शुम्भ व निशुम्भ नामक असुरों तथा उनके सेनापति रक्तबीज का वध करती हैं, जिसके रक्त की हर बूंद भूमि पर गिरते ही एक नए रक्तबीज को जन्म देती थी — इस दुर्निवार संकट का समाधान देवी काली ने उसका रक्त धरती पर गिरने से पूर्व ही अपनी विशाल जिह्वा से पी लेने की युक्ति से किया। देवी माहात्म्य के अंत में राजा सुरथ व समाधि, देवी की कठोर तपस्या व आराधना करते हैं, जिससे प्रसन्न होकर देवी उन्हें वरदान देती हैं — राजा सुरथ को अगले जन्म में सूर्यवंश में सावर्णि नामक मनु बनने का तथा समाधि को आत्म-ज्ञान प्राप्त होने का। यह समापन-प्रसंग यह शिक्षा देता है कि सच्ची श्रद्धा व साधना से देवी प्रसन्न होकर भौतिक व आध्यात्मिक — दोनों प्रकार के वरदान प्रदान करती हैं। देवी माहात्म्य के पश्चात् पुराण पुनः जैमिनि के शेष प्रश्नों के उत्तर, युगों के लक्षणों तथा धर्म-सम्बन्धी अन्य विवेचनों की ओर लौटता है, जिसमें कलियुग के लक्षणों का भी विस्तृत वर्णन है — अधर्म की वृद्धि, सत्य का ह्रास, तथा धन को ही सर्वोच्च मानने की प्रवृत्ति — और विविध नैतिक व दार्शनिक शिक्षाओं के साथ अपना समापन करता है। मार्कण्डेय पुराण की यही विशेषता है कि यह एक ओर महाभारत के गूढ़ प्रश्नों का समाधान करता है, स्वयं मार्कण्डेय की चिरंजीवी-कथा के माध्यम से सृष्टि-प्रलय के शाश्वत चक्र का दर्शन कराता है, तो दूसरी ओर देवी माहात्म्य के माध्यम से शक्ति-उपासना की सर्वाधिक प्रभावशाली व प्रिय परम्परा को जन्म देता है — यही कारण है कि करोड़ों भक्तों के लिए यह पुराण केवल एक ग्रन्थ नहीं, अपितु प्रत्यक्ष आदिशक्ति की आराधना का माध्यम बन गया है। (यह मार्कण्डेय पुराण, विशेषकर देवी माहात्म्य, का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — श्लोकों का शब्दशः अनुवाद अथवा सम्पूर्ण चण्डी पाठ नहीं। सम्पूर्ण पाठ व श्लोकों हेतु किसी मान्य संस्करण अथवा दुर्गा सप्तशती के प्रामाणिक पाठ का अवलोकन करें।)