पुराण ६

नारद पुराण

नारद पुराण देवर्षि नारद के नाम पर प्रसिद्ध है, यद्यपि इसकी रचना महर्षि सनक द्वारा स्वयं देवर्षि नारद को उपदेश के रूप में हुई मानी जाती है। यह पुराण अपनी विशिष्ट रचना-शैली के लिए जाना जाता है — यह मुख्यतः व्रत-विधान, तीर्थ-माहात्म्य, मंत्र-साधना तथा भक्ति-सिद्धांत पर केन्द्रित एक अत्यंत व्यावहारिक, कर्मकाण्ड-प्रधान ग्रन्थ है, जो सामान्य गृहस्थ साधक के दैनिक व पर्व-सम्बन्धी आचरण हेतु विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह पूर्वभाग व उत्तरभाग — दो भागों में विभक्त है, जिनमें पूर्वभाग व्रत-तीर्थ-मंत्र पर तथा उत्तरभाग मुख्यतः भक्ति-दर्शन पर केन्द्रित है। इस पुराण की एक अत्यंत विशिष्ट व दुर्लभ विशेषता यह है कि इसमें स्वयं अठारह महापुराणों का संक्षिप्त परिचय व सूचीकरण प्राप्त होता है — प्रत्येक पुराण का नाम, उसके अनुमानित श्लोक-संख्या, तथा उसकी मूल विषय-वस्तु का संक्षिप्त उल्लेख यहां मिलता है। यह दर्शाता है कि पुराण-साहित्य अपने आप में एक सचेत, व्यवस्थित परम्परा के रूप में विकसित हुआ था, जिसमें प्रत्येक ग्रन्थ अपनी समग्र संरचना के प्रति सजग था, और यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रन्थों को सत्त्व, रज व तम — तीन गुणों के अनुसार भी वर्गीकृत किया गया है, जिसमें विष्णु-प्रधान पुराणों (विष्णु, भागवत, नारद, गरुड़, पद्म, वराह) को सात्त्विक, ब्रह्मा-प्रधान (ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, भविष्य, वामन) को राजसिक तथा शिव-प्रधान (मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कन्द, अग्नि) को तामसिक श्रेणी में रखा गया है — यद्यपि यह वर्गीकरण गुण-प्रधानता के आधार पर है, श्रेष्ठता-निम्नता के आधार पर नहीं। पुराण में एकादशी व्रत का अत्यंत विस्तृत वर्णन है — प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों (शुक्ल व कृष्ण पक्ष) के पृथक-पृथक नाम, जैसे पापमोचनी, कामदा, निर्जला, देवशयनी, देवउठनी आदि, उनकी पृथक-पृथक कथाएं, तथा उनके पालन से प्राप्त होने वाले विशिष्ट पुण्य-फल का वर्णन इसमें मिलता है। इसी प्रकार अन्य अनेक व्रतों — जैसे प्रदोष व्रत (शिव-आराधना हेतु प्रत्येक त्रयोदशी को), सोमवार व्रत, तथा विभिन्न पर्वों से सम्बन्धित उपवासों — की विधि, संकल्प-मंत्र व महत्व का भी विशद विवेचन है। तीर्थ-माहात्म्य के अंतर्गत अनेक पवित्र स्थलों की यात्रा-विधि, वहां किए जाने वाले स्नान, दान व तर्पण के नियम, तथा यात्रा में बरती जाने वाली सावधानियां विस्तार से वर्णित हैं — पुराण स्पष्ट करता है कि केवल शारीरिक यात्रा पर्याप्त नहीं, अपितु तीर्थ-यात्रा के दौरान मन की पवित्रता, सत्य-वाचन व संयम भी अनिवार्य है, अन्यथा यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। पुराण में काशी, प्रयाग, गया, हरिद्वार व बद्रीनाथ जैसे प्रमुख तीर्थों के पृथक-पृथक माहात्म्य का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके साथ ही पुराण में मंत्र-साधना व उपासना-विधि का भी गहन वर्णन है — विशेषतः विष्णु-भक्ति को केन्द्र में रखते हुए, विभिन्न मंत्रों के जप-विधान, माला-जप की संख्या व नियम, उनके अधिकारी-भेद, तथा साधना में आने वाली बाधाओं के निवारण के उपाय बताए गए हैं। पंचरात्र सम्प्रदाय की उपासना-पद्धति, तथा विशेषतः "ओम नमो नारायणाय" के अष्टाक्षर मंत्र की महिमा का भी इसमें विशेष उल्लेख है, साथ ही मूर्ति-स्थापना व मंदिर-निर्माण की सामान्य विधि का भी संक्षिप्त वर्णन मिलता है। गायत्री मंत्र की महिमा व उसके जप-विधान का भी एक पृथक अध्याय इसमें प्राप्त होता है, जिसमें इसे वेदमाता के रूप में वर्णित किया गया है। पुराण में एक रोचक उपाख्यान मोहिनी नामक अप्सरा व महर्षि पर्वत के मध्य के संवाद के रूप में भी आता है, जिसमें धर्म व काम के मध्य के संतुलन पर गहन चर्चा हुई है। एक अन्य प्रसंग में प्रह्लाद के वंश में उत्पन्न राजा मुचुकुंद की कथा भी संक्षेप में आती है, जिन्होंने देवताओं की सहायता हेतु दीर्घकाल तक युद्ध किया और अंततः एक दीर्घ निद्रा का वरदान प्राप्त किया — वही निद्रा जिसमें से उन्हें कालयवन के विनाश हेतु श्रीकृष्ण ने जगाया, तथा उनकी दृष्टि-मात्र से कालयवन भस्म हो गया, क्योंकि राजा ने यह वरदान भी मांगा था कि जो कोई उन्हें अकस्मात जगाएगा, वह तत्काल भस्म हो जाए। पुराण धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष — चारों पुरुषार्थों के संतुलित पालन पर बल देता है, तथा यह स्पष्ट करता है कि केवल त्याग ही मोक्ष का मार्ग नहीं, अपितु अपने गृहस्थ-कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक, भक्ति-भाव से पालन करते हुए भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। नारद पुराण में सृष्टि, कल्प व मन्वन्तरों का भी वर्णन है, तथा व्याकरण, ज्योतिष, छन्द व निरुक्त जैसे वेदांगों का भी संक्षिप्त परिचयात्मक विवेचन इसमें मिलता है, जो इस पुराण को एक प्रकार से सामान्य ज्ञान का विश्वकोश भी बनाता है। उत्तरभाग में भगवान के सहस्रनामों, विशेषकर विष्णु-सहस्रनाम का भी उल्लेख मिलता है, तथा भक्ति के नौ रूपों (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य व आत्मनिवेदन — नवधा भक्ति) का भी विस्तृत विवेचन इसमें प्राप्त होता है, जो भक्ति-मार्ग के साधकों हेतु एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका का कार्य करता है। अंत में मुक्ति के विभिन्न प्रकारों — सालोक्य (भगवान के लोक में निवास), सामीप्य (भगवान के समीप रहना), सारूप्य (भगवान के समान रूप प्राप्त करना) व सायुज्य (भगवान में ही पूर्ण लीन हो जाना) — का विवेचन करते हुए यह दर्शाया गया है कि भक्ति-मार्ग से प्राप्त होने वाली मुक्ति ज्ञान-मार्ग की अपेक्षा अधिक सुगम व सर्वसुलभ है, क्योंकि इसमें कठोर तप की अपेक्षा श्रद्धा व समर्पण ही पर्याप्त है। नारद पुराण की यह विशेषता है कि यह पुराण-साहित्य को एक व्यावहारिक, दैनंदिन जीवन में उतारने योग्य आचार-संहिता के रूप में प्रस्तुत करता है — यह केवल कथाएं नहीं सुनाता, अपितु यह भी सिखाता है कि किस व्रत का पालन कब, कैसे व किस भावना से करना चाहिए, जिससे साधारण गृहस्थ भी अपने दैनिक जीवन में धर्माचरण को सहजता से समाहित कर सके, तथा नवधा भक्ति के माध्यम से यह भी स्पष्ट करता है कि भक्ति को जटिल कर्मकाण्ड न बनाकर एक सहज, सर्वसुलभ, नौ भिन्न-भिन्न मार्गों से भी पाई जाने वाली अनुभूति के रूप में प्रस्तुत करता है। (यह नारद पुराण का एक विस्तृत, प्रवचन-शैली परिचय है — इसके समस्त अध्यायों, व्रत-विधानों व श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं। पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययन हेतु किसी मान्य संस्करण का अवलोकन करें।)